गुप्त नवरात्रि विशेष

गुप्त नवरात्रि में कई साधक गुप्त साधनाएं करने शमशान व गुप्त स्थान पर जाते हैं । कई साधक श्रीविद्या की उपासना घरमें ही करते हैं। नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्तियों में वृद्धि करने के लिये अनेक प्रकार के उपवास, संयम, नियम, भजन, पूजन योग साधना आदि करते हैं । सभी नवरात्रों में माता के सभी 51पीठों पर भक्त विशेष रुप से माता के दर्शनों के लिये एकत्रित होते हैं । माघ मास की नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहते हैं, क्योंकि इसमें गुप्त रूप से शिव व शक्ति की उपासना की जाती है जबकि चैत्र व शारदीय नवरात्रि में सार्वजिनक रूप में माता की भक्ति करने का विधान है । आषाढ़ मास की गुप्त नवरात्रि में जहां वामाचार उपासना की जाती है । वहीं माघ मास की गुप्त नवरात्रि में वामाचार पद्धति को अधिक मान्यता नहीं दी गई है । ग्रंथों के अनुसार माघ मास के शुक्ल पक्ष का विशेष महत्व है

जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते “सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित: ।

मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय: ॥”

प्रत्यक्ष फल देते हैं गुप्त नवरात्र

गुप्त नवरात्र में दशमहाविद्याओं की साधना कर ऋषि विश्वामित्र अद्भुत शक्तियों के स्वामी बन गए। उनकी सिद्धियों की प्रबलता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक नई सृष्टि की रचना तक कर डाली थी । इसी तरह, लंकापति रावण के पुत्र मेघनाद ने अतुलनीय शक्तियां प्राप्त करने के लिए गुप्त नवरात्रों में साधना की थी शुक्राचार्य ने मेघनाद को परामर्श दिया था कि गुप्त नवरात्रों में अपनी कुलदेवी निकुम्बाला की साधना करके वह अजेय बनाने वाली शक्तियों का स्वामी बन सकता है…गुप्त नवरात्र दस महाविद्याओं की साधना की जाती है । गुप्त नवरात्रों से एक प्राचीन कथा जुड़ी हुई है एक समय ऋषि श्रृंगी भक्त जनों को दर्शन दे रहे थे अचानक भीड़ से एक स्त्री निकल कर आई और करबद्ध होकर ऋषि श्रृंगी से बोली कि मेरे पति दुर्व्यसनों से सदा घिरे रहते हैं । जिस कारण मैं कोई पूजा-पाठ नहीं कर पाती धर्म और भक्ति से जुड़े पवित्र कार्यों का संपादन भी नहीं कर पाती । यहां तक कि ऋषियों को उनके हिस्से का अन्न भी समर्पित नहीं कर पाती मेरा पति मांसाहारी हैं, जुआरी है । लेकिन मैं मां दुर्गा कि सेवा करना चाहती हूं । उनकी भक्ति साधना से जीवन को पति सहित सफल बनाना चाहती हूं । ऋषि श्रृंगी महिला के भक्तिभाव से बहुत प्रभावित हुए । ऋषि ने उस स्त्री को आदरपूर्वक उपाय बताते हुए कहा कि वासंतिक और शारदीय नवरात्रों से तो आम जनमानस परिचित है लेकिन इसके अतिरिक्त दो नवरात्र और भी होते हैं । जिन्हें गुप्त नवरात्र कहा जाता है प्रकट नवरात्रों में नौ देवियों की उपासना हाती है और गुप्त नवरात्रों में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है । इन नवरात्रों की प्रमुख देवी स्वरुप का नाम सर्वैश्वर्यकारिणी देवी है । यदि इन गुप्त नवरात्रों में कोई भी भक्त माता दुर्गा की पूजा साधना करता है तो मां उसके जीवन को सफल कर देती हैं । लोभी, कामी, व्यसनी, मांसाहारी अथवा पूजा पाठ न कर सकने वाला भी यदि गुप्त नवरात्रों में माता की पूजा करता है तो उसे जीवन में कुछ और करने की आवश्यकता ही नहीं रहती । उस स्त्री ने ऋषि श्रृंगी के वचनों पर पूर्ण श्रद्धा करते हुए गुप्त नवरात्र की पूजा की मां प्रसन्न हुई और उसके जीवन में परिवर्तन आने लगा, घर में सुख शांति आ गई । पति सन्मार्ग पर आ गया और जीवन माता की कृपा से खिल उठा । यदि आप भी एक या कई तरह के दुर्व्यसनों से ग्रस्त हैं और आपकी इच्छा है कि माता की कृपा से जीवन में सुख समृद्धि आए तो गुप्त नवरात्र की साधना अवश्य करें । तंत्र और शाक्त मतावलंबी साधना के दृष्टि से गुप्त नवरात्रों के कालखंड को बहुत सिद्धिदायी मानते हैं । मां वैष्णो देवी, पराम्बा देवी और कामाख्या देवी का का अहम् पर्व माना जाता है । हिंगलाज देवी की सिद्धि के लिए भी इस समय को महत्त्वपूर्ण माना जाता है । शास्त्रों के अनुसार दस महाविद्याओं को सिद्ध करने के लिए ऋषि विश्वामित्र और ऋषि वशिष्ठ ने बहुत प्रयास किए लेकिन उनके हाथ सिद्धि नहीं लगी । वृहद काल गणना और ध्यान की स्थिति में उन्हें यह ज्ञान हुआ कि केवल गुप्त नवरात्रों में शक्ति के इन स्वरूपों को सिद्ध किया जा सकता है । गुप्त नवरात्रों में दशमहाविद्याओं की साधना कर ऋषि विश्वामित्र अद्भुत शक्तियों के स्वामी बन गए उनकी सिद्धियों की प्रबलता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक नई सृष्टि की रचना तक कर डाली थी । इसी तरह, लंकापति रावण के पुत्र मेघनाद ने अतुलनीय शक्तियां प्राप्त करने के लिए गुप्त नवरात्र में साधना की थी शुक्राचार्य ने मेघनाद को परामर्श दिया था कि गुप्त नवरात्रों में अपनी कुल देवी निकुम्बाला कि साधना करके वह अजेय बनाने वाली शक्तियों का स्वामी बन सकता है मेघनाद ने ऐसा ही किया और शक्तियां हासिल की राम, रावण युद्ध के समय केवल मेघनाद ने ही भगवान राम सहित लक्ष्मण जी को नागपाश मे बांध कर मृत्यु के द्वार तक पहुंचा दिया था ऐसी मान्यता है कि यदि नास्तिक भी परिहासवश इस समय मंत्र साधना कर ले तो उसका भी फल सफलता के रूप में अवश्य ही मिलता है । यही इस गुप्त नवरात्र की महिमा है यदि आप मंत्र साधना, शक्ति साधना करना चाहते हैं और काम-काज की उलझनों के कारण साधना के नियमों का पालन नहीं कर पाते तो यह समय आपके लिए माता की कृपा ले कर आता है गुप्त नवरात्रों में साधना के लिए आवश्यक न्यूनतम नियमों का पालन करते हुए मां शक्ति की मंत्र साधना कीजिए । गुप्त नवरात्र की साधना सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं गुप्त नवरात्र के बारे में यह कहा जाता है कि इस कालखंड में की गई साधना निश्चित ही फलवती होती है हां । इस समय की जाने वाली साधना की गुप्त बनाए रखना बहुत आवश्यक है । अपना मंत्र और देवी का स्वरुप गुप्त बनाए रखें । गुप्त नवरात्र में शक्ति साधना का संपादन आसानी से घर में ही किया जा सकता है । इस महाविद्याओं की साधना के लिए यह सबसे अच्छा समय होता है गुप्त व चामत्कारिक शक्तियां प्राप्त करने का यह श्रेष्ठ अवसर होता है । धार्मिक दृष्टि से हम सभी जानते हैं कि नवरात्र देवी स्मरण से शक्ति साधना की शुभ घड़ी है । दरअसल इस शक्ति साधना के पीछे छुपा व्यावहारिक पक्ष यह है कि नवरात्र का समय मौसम के बदलाव का होता है । आयुर्वेद के मुताबिक इस बदलाव से जहां शरीर में वात, पित्त, कफ में दोष पैदा होते हैं, वहीं बाहरी वातावरण में रोगाणु जो अनेक बीमारियों का कारण बनते हैं सुखी-स्वस्थ जीवन के लिये इनसे बचाव बहुत जरूरी है नवरात्र के विशेष काल में देवी उपासना के माध्यम से खान-पान, रहन-सहन और देव स्मरण में अपनाने गए संयम और अनुशासन तन व मन को शक्ति और ऊर्जा देते हैं जिससे इंसान निरोगी होकर लंबी आयु और सुख प्राप्त करता है धर्म ग्रंथों के अनुसार गुप्त नवरात्र में प्रमुख रूप से भगवान शंकर व देवी शक्ति की आराधना की जाती है ।

देवी दुर्गा शक्ति का साक्षात स्वरूप है दुर्गा शक्ति में दमन का भाव भी जुड़ा है । यह दमन या अंत होता है शत्रु रूपी दुर्गुण, दुर्जनता, दोष, रोग या विकारों का ये सभी जीवन में अड़चनें पैदा कर सुख-चैन छीन लेते हैं । यही कारण है कि देवी दुर्गा के कुछ खास और शक्तिशाली मंत्रों का देवी उपासना के विशेष काल में जाप शत्रु, रोग, दरिद्रता रूपी भय बाधा का नाश करने वाला माना गया है सभी’नवरात्र’ शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर नवमी तक किए जाने वाले पूजन, जाप और उपवास का प्रतीक है- ‘नव शक्ति समायुक्तां नवरात्रं तदुच्यते’ । देवी पुराण के अनुसार एक वर्ष में चार माह नवरात्र के लिए निश्चित हैं ।

नवरात्र के नौ दिनों तक समूचा परिवेश श्रद्धा व भक्ति, संगीत के रंग से सराबोर हो उठता है । धार्मिक आस्था के साथ नवरात्र भक्तों को एकता, सौहार्द, भाईचारे के सूत्र में बांधकर उनमें सद्भावना पैदा करता है शाक्त ग्रंथो में गुप्त नवरात्रों का बड़ा ही माहात्म्य गाया गया है । मानव के समस्त रोग-दोष व कष्टों के निवारण के लिए गुप्त नवरात्र से बढ़कर कोई साधनाकाल नहीं हैं । श्री, वर्चस्व, आयु, आरोग्य और धन प्राप्ति के साथ ही शत्रु संहार के लिए गुप्त नवरात्र में अनेक प्रकार के अनुष्ठान व व्रत-उपवास के विधान शास्त्रों में मिलते हैं । इन अनुष्ठानों के प्रभाव से मानव को सहज ही सुख व अक्षय ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है ‘दुर्गावरिवस्या’ नामक ग्रंथ में स्पष्ट लिखा है कि साल में दो बार आने वाले गुप्त नवरात्रों में माघ में पड़ने वाले गुप्त नवरात्र मानव को न केवल आध्यात्मिक बल ही प्रदान करते हैं, बल्कि इन दिनों में संयम-नियम व श्रद्धा के साथ माता दुर्गा की उपासना करने वाले व्यक्ति को अनेक सुख व साम्राज्य भी प्राप्त होते हैं । ‘शिवसंहिता’ के अनुसार ये नवरात्र भगवान शंकर और आदिशक्ति मां पार्वती की उपासना के लिए भी श्रेष्ठ हैं । गुप्त नवरात्रों के साधनाकाल में मां शक्ति का जप, तप, ध्यान करने से जीवन में आ रही सभी बाधाएं नष्ट होने लगती हैं ।

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् ।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥

देवी भागवत के अनुसार जिस तरह वर्ष में चार बार नवरात्र आते हैं और जिस प्रकार नवरात्रि में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है । ठीक उसी प्रकार गुप्त नवरात्र में दस महाविद्याओं की साधना की जाती है ।

गुप्त नवरात्रि विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्त्व रखती है । इस दौरान देवी भगवती के साधक बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करते हैं । इस दौरान लोग लंबी साधना कर दुर्लभ शक्तियों की प्राप्ति करने का प्रयास करते हैं । गुप्त नवरात्र के दौरान कई साधक महाविद्या (तंत्र साधना) के लिए मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां ध्रूमावती, माता बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी की पूजा करते हैं । मान्यता है कि नवरात्र में महाशक्ति की पूजा कर श्रीराम ने अपनी खोई हुई शक्ति पाई । इसलिए इस समय आदिशक्ति की आराधना पर विशेष बल दिया गया है । संस्कृत व्याकरण के अनुसार नवरात्रि कहना त्रुटिपूर्ण हैं । नौ रात्रियों का समाहार, समूह होने के कारण से द्वन्द समास होने के कारण यह शब्द पुलिंग रूप ‘नवरात्र’ में ही शुद्ध है ।

गुप्त नवरात्र पूजा विधि

मान्यतानुसार गुप्त नवरात्र के दौरान अन्य नवरात्रों की तरह ही पूजा करनी चाहिए। नौ दिनों के उपवास का संकल्प लेते हुए प्रतिप्रदा यानि पहले दिन घटस्थापना करनी चाहिए। घटस्थापना के बाद प्रतिदिन सुबह और शाम के समय मां दुर्गा की पूजा करनी चाहिए। अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन के साथ नवरात्र व्रत का उद्यापन करना चाहिए।

मेष राशि इस राशि के लोगों को स्कंदमाता की पूजा करनी चाहिए। दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ करें।

वृषभ राशि इस राशि के लोग देवी के महागौरी स्वरुप की पूजा करें व ललिता सहस्त्रनाम का पाठ करें।

मिथुन राशि इस राशि के लोग देवी यंत्र स्थापित कर मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करें। इससे इन्हें लाभ होगा।

कर्क राशि इस राशि के लोगों को मां शैलपुत्री की उपासना करनी चाहिए। लक्ष्मी सहस्त्रनाम का पाठ भी करें।

सिंह राशि इस राशि के लोगों के लिए मां कूष्मांडा की पूजा विशेष फल देने वाली है। दुर्गा मन्त्रों का जाप करें।

कन्या राशि इस राशि के लोग मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करें। लक्ष्मी मंत्रो का विधि-विधान पूर्वक जाप करें।

तुला राशि इस राशि के लोगों को महागौरी की पूजा से लाभ होता है। काली चालीसा का पाठ करें।

वृश्चिक राशि स्कंदमाता की पूजा से इस राशि वालों को शुभ फल मिलते हैं। दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।

धनु राशि इस राशि के लोग मां चंद्रघंटा की आराधना करें। साथ ही उनके मन्त्रों का विधि-विधान से जाप करें।

मकर राशि इस राशि वालों के लिए मां काली की पूजा शुभ मानी गई है। नर्वाण मन्त्रों का जाप करें।

कुंभ राशि इस राशि के लोग मां कालरात्रि की पूजा करें। नवरात्रि के दौरान रोज़ देवी कवच का पाठ करें।

मीन राशि इस राशि वाले मां चंद्रघंटा की पूजा करें। हल्दी की माला से बगलामुखी मंत्रो का जाप भी करें।

Shri Chakra -Microcosm and Macrocosm

श्रीचक्र : देहचक्र और विश्वचक्र

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श्रीचक्र विश्वचक्र है । श्रीचक्र प्रकृति , मन , जीवन , काल ,अन्तरिक्ष और जीवन की व्याख्या है । देह पिंडात्मक -श्रीचक्र है और ब्रह्मांड विश्वात्मक श्रीचक्र है ।

श्रीचक्र की रचना देखिये >> एक कोण दूसरे कोण से संस्पृष्ट और सापेक्ष है ।इसी प्रकार संपूर्ण चराचर-सृष्टि में सब-कुछ से सब-कुछ जुडा हुआ है , कोई भी किसी से विच्छिन्न नहीं है ।प्राकृतिक-प्रक्रिया हो या मानवीय-प्रक्रिया ,भौतिक-प्रक्रिया हो या मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया ,,व्यष्टिप्रक्रिया हो या सामाजिकप्रक्रिया ,भावप्रक्रिया हो या विचारप्रक्रिया > कोई भी अपने आप में स्वतन्त्र नहीं है ।श्रीचक्र में सृष्टिक्रम भी है और संहारक्रम भी है ।बिन्दु से भूपुर और भूपुर से बिन्दु छत्तीस-तत्वों का विलास है ।

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(THIS IS THE REAL SRIYANTRA WORSHIPPED BY AGASTHYA MAHA MUNI AND HIS WIFE BHAGAVATHI LOPAMUDRA WHO IS THE MOTHER OF ALL SRIVIDYA UPASAKAS.IT IS STILL PRESENT IN SALEM.AGASTHYA AND LOPAMUDRA MEDITATED AND DID POOJA FOR THIS FOR MANY YEARS IN A CAVE.)

श्रीविद्या

श्रीविद्या उस अनन्त-सत्ता से तादात्म्य प्राप्त करने की साधना-संबंधी विद्या है । श्रीविद्या स्वात्म को विश्वात्म , देह को देवालय , पिंड को ब्रह्मांड बना लेने की विद्या है । श्रीविद्या चराचर के अस्तित्व तथा गति के तत्वबोध की विद्या है ।श्रीविद्या ध्यानध्यातृध्येय के एकाकार-एकरस होने की विद्या है । श्रीविद्या जीवसत्ता के शिवसत्ता में संक्रमण की विद्या है ।श्रीविद्या जडता को लांघ कर चिन्मय-प्रदेश में प्रवेश पाने की विद्या है । श्रीविद्या शक्ति और प्रकृति की उपासना है ,पूर्ण की उपासना है , सर्व की उपासना है , विराट की उपासना है ,श्रीविद्या अभेद की उपासना है ,आनन्दमयराज्य में प्रवेश की उपासना है । श्रीविद्या करुणा की उपासना है । श्रीविद्या सौन्दर्य-माधुर्य की उपासना है ।श्रीविद्या उस अचिन्त्य ऊर्जा की उपासना है ,जिससे विश्व-ब्रह्मांड तथा व्यष्टि-समष्टि का जीवन संचालित हो रहा है ।वायु बह रही है ,सुगन्धि बिखर रही है , मेघ आ रहे हैं , वर्षा हो रही है , कालचक्र चल रहा है , श्वास-प्रश्वास चल रहा है ,बीज वृक्ष बन रहा है और वृक्ष पुन: बीज रूप में समाहित हो रहा है ।

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वाक : वैखरी : मध्यमा :भाषा : शब्द और विंब

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शब्द की रचना-प्रक्रिया क्या है ?

वर्णसमुच्चय कहें या ध्वनिसमुच्चय कहें , जो भी कहें ,वह स्थूल-रूप है ।वैखरी !

अब इसके सूक्ष्म-रूप की ओर जैसे-जैसे बढेंगे , हमें मन और चेतना की भूमि में प्रवेश पाना होगा ।

क्या वह वर्णसमुच्चय या ध्वनिसमुच्चय किसी विंब के आश्रय के बिना कोई भी अर्थ दे सकता था ?

विंब मन में उतरे थे ,इन्द्रिय-संयोग से !

कान से ध्वनि-विंब आया > यह खटखट है या धमाका है ,या मेघगर्जन है ,या कोकिल का गीत है , या कौआ का कान फोडने वाला स्वर !

नाक से घ्राण-विंब मन को मिले >> इत्र है या बदबू ? यह गुलाब है या चमेली । या गैस की गन्ध है ।

इसी प्रकार जीभ से रस या स्वाद के विंब मिले , आंख से सुन्दर -असुन्दर और आकार-प्रकार के विंब आये , त्वक से स्पर्श-विंब आये ।

अब एक ओर इन्द्रिय-चेतना या इन्द्रिय-संवेदना ने बाह्यजगत को सूक्ष्म और विंबात्मक अन्तर्जगत बना दिया । अनुभूति की प्रक्रिया ।

एक प्रक्रिया से बाहर का जगत अन्दर आया था , अब दूसरी प्रक्रिया मचलने लगी ,अन्दर से बाहर की ओर ।अभिव्यक्ति ।

अभिव्यक्ति की प्रक्रिया ने वर्णसमुच्चय या ध्वनिसमुच्चय में विंब का आधान किया ।

यह प्रक्रिया जो अन्दर ही अन्दर होती रही , वाक की मध्यमा-भूमि है ।

मूलाधारात्प्रथममुदितो यश्च भाव:पराख्य: ,

पश्चात्पश्यन्त्यथ हृदयगोबुद्धिभुंग्मध्यमाख्य:॥

व्यक्ते वैखर्यथ रुरुदिषोरस्य जन्तो: सुषुम्णा,

बद्धस्तस्माद्भवति पवनप्रेरित:वर्ण-संज्ञा ॥

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स्थूलं शब्द इति प्रोक्तं ,सूक्ष्मं चिन्तामयं भवेत्‌ ।

चिन्तया रहितं यत्तु तत्परं परिकीर्तितं ।

शब्द : जब कानों से सुनाई दे रहा है ,तो वह इन्द्रियगम्य है ,स्थूल है । किन्तु जब वह मन में ही भाव-विचार या चिन्ता-चिन्तन रूप था ,तब इन्द्रियगम्य नहीं था । इसलिये वह सूक्ष्म था । इससे भी पहले वह पर-रूप था । मन या चेतना के किसी अचेतन-अवचेतन में खोया हुआ !

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सबद ही सबद भयौ उजियारौ !

शब्द को शास्त्र ने ज्योति कहा है , तुरीय-ज्योति ! चतुर्थ प्रकाश ।

तीन ज्योतियां हैं > सूर्य ,चन्द्र ,अग्नि-विद्युत ।

इनके प्रकाश के अभाव में आंख [इन्द्रिय ] देख नहीं सकती ।

किन्तु जहां इनका प्रकाश नहीं हो पाता , वहां शब्द का प्रकाश होता है ।

बाहर घनघोर अंधेरा है ।

अरे तुम कहां हो?

हां यहां हूं ।

शब्द ने प्रकाशित कर दिया ।

इसी प्रकार अन्दर मन में सूर्य ,चन्द्र ,अग्नि-विद्युत का प्रकाश नहीं पंहुच पाया , वहां शब्द का प्रकाश हो जाता है ।

सबद ही सबद भयौ उजियारौ !

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अत्र सखाय: सख्यानि जानते

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सक्तुमिव तितौना पुनन्तो,

यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत ।

अत्र सखाय: सख्यानि जानते ,

भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधिवाचि ।

ऋग्वेद

जैसे सत्तू को छाना जाता है ,भूसी अलग की जाती है ।अनाज का शु्द्ध- तत्व ग्रहण कर लिया जाता है , उसी प्रकार ध्यान-परायण मनीषिय़ों ने मन:पूत वाणी की रचना की ।

भाषा का उदात्त-रूप ।

यह वाणी है,जिसमें मित्र लोग मैत्री की पहचान कर लेते हैं ,जो परस्पर-मित्रत्व को पा चुके हैं ,उनकी शोभा इसी वाणी में निवास करती है ।

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।।श्री श्रीयंत्र।।

श्रीयंत्र का स्वरूप रचना, नवचक्रों का विवरण तथा श्रीयंत्र दर्शन की महिमा।।

श्रीयंत्र का विषय अत्यन्त जटिल तथा परमगहन है। जिस प्रकार एक नया तैराक जो सीमित आकार के तरणताल में तैरने का अभ्यस्त नहीं है वह किसी महासागर में तैरने का दुःस्साहस नहीं कर सकता उसी प्रकार मुझ जैसे अल्पज्ञ व्यक्ति के लिए इस विषय पर कुछ भी लिखना आकाशकुसुम तोड़ने के समान ही है। जितना भी लिखा जा रहा है वह इस विषय के वास्तविक ज्ञान का करोड़वां अंश भी नहीं है।

श्रीयंत्र की उपासना श्रीविद्या उपासना की परमगोपनीय तथा सांकेतिक विधा (क्रिया) है। इसकी उपासना केवल उत्तमाधिकारी एवं सत्व-प्रधान मन वाला साधक ही कर सकता है। ऐसे गोपनीय विषयों का सर्वसाधारण के समक्ष प्रकटीकरण करना भी ‘‘कौलोपनिषद्’’ के अनुसार वर्जित है-

प्राकट्यं न कुर्यात्’

‘कौल प्रतिष्ठा न कुर्यात्’

शिष्याय वदेत्’

प्रकाशात् सिद्धिहानिस्यात्’

(उपासना सम्बन्धी गंभीर रहस्यों को सबके समक्ष प्रकाशित नहीं करना चाहिए)

श्रीयंत्र में निहित अनेक रहस्यमय सिद्धान्तों में से एक सिद्धान्त ‘पिन्डान्ड के अन्दर ब्रह्मान्ड’ तथा ‘ब्रह्मान्ड के अन्दर पिन्डान्ड’ अर्थात् पिन्ड-ब्रहमान्ड की ऐक्यता से सम्बन्धित भी है। इस रहस्य को ब्रह्मनिष्ट गुरू से ही समझा जा सकता है। सामान्य व्यक्ति जो इस विषय को समझने में प्रयोग होने वाली शब्दावली से ही अपरिचित है वह कितने ही ग्रन्थ पढ़ले तब भी इसके तत्व को स्पर्श तक नहीं कर सकेगा। पिन्ड-ब्रह्मान्ड, आत्मतत्व-विद्यातत्व, शिवतत्व,वाम-दक्षिण मार्ग, त्रिपुटी, ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय, माता-मान-मेय,मेरू-कैलाश-भू-प्रस्तार, नाद-बिन्दु-कला, प्रमाता-प्रमाण-प्रमेय, पंचभूत-पंचतन्मात्रा-पंचप्राण, परा-पश्यन्ती-मध्यमा-बैरवरी, शब्द सृष्टि, अर्थसृष्टि जैसे शब्दों में निहित अर्थों का ज्ञान होना श्रीयंत्र के विषय को समझने के लिए आवश्यक है।

श्रीयंत्र का विषय सैद्धान्तिक ज्ञान तथा तर्क का न होकर पूर्णतया ब्यवहारपरक, श्रमसाध्य, वित्तसाध्य तथा समयसाध्य है। यदि दीक्षाप्राप्त साधक भी नित्य यंत्रार्चन (चक्रार्चन) करेगा तो उसे महाराजराजेश्वरी की पूजा-उपासना के अनुकूल तथा कुलाचार के अनुसार विभिन्न पूजन सामग्रियों की व्यवस्था के लिए पर्याप्त धनराशि की आवश्यकता होगी तथा दीर्घकाल तक परिश्रमपूर्वक अनुष्ठान करना पड़ेगा तभी उसे श्रीयंत्र पूजा के फलस्वरूप वास्तविक ज्ञान तथा वांछित सिद्धि प्राप्त हो सकेगी।

।। श्रीयंत्र का स्वरूप।।

श्रीयंत्र का तात्पर्य है श्री विद्या (महात्रिपुरसुन्दरी) का यंत्र अथवा श्री का गृह जिसमें वह निवास करती है। अतः उनके गृह का आश्रय लिए बिना उनसे मिलन नहीं हो सकता है। माँ भगवती की उपासना हेतु मंत्रों तथा यंत्रों का प्रयोग किया जाता है। शास्त्रों का अभिमत है कि यदि गुरू द्वारा प्राप्त मंत्र का निर्धारित संख्या में जप किया जाये तो उपासक को उस मंत्र की अधिष्ठात्री देवी/देवता का साकार रूप दृष्टिगोचर हो जाता है। श्रीयंत्र स्वयं में श्री महात्रिपुरसुन्दरी का विशिष्ट ज्यामितीय स्वरूप है जिसकी रचना में बिन्दु, त्रिकोणों, वृत्तों तथा चतुर्भुजों का प्रयोग किया जाता है। शास्त्रों में यंत्र को देवी का शरीर तथा मंत्र को देवी की आत्मा बताया गया है। अन्य महाविद्याओं के यंत्रों की तुलना में श्रीयंत्र को अत्यन्त जटिल तथा सर्वश्रेष्ट माना गया है। इसीलिए श्रीयंत्र को यंत्रराज की उपमा से विभूषित किया गया है। इस यंत्र में समस्त ब्रह्मान्ड की उत्पत्ति तथा विकास का अद्भुत चित्रण करने के साथ ही इसका मानव शरीर तथा उसकी समस्त क्रियाओं के साथ सूक्ष्मतर तादात्म्य स्थापित किया गया है। शास्त्र बताते हैं कि श्रीयंत्र ब्रहमान्डाकार भी है तथा पिन्डाकार भी है। इस प्रकार समस्त ब्रह्मान्ड ही श्रीविद्या का गृह है। श्री शिव माँ पार्वती से कहते हैं –

‘चक्रं त्रिपुरसुन्दर्या-ब्रहमान्डाकार मीश्वरि।’

जबकि भावनोपनिषद् मानवदेह को ही नवचक्रमय श्री यंत्र मानता है

‘नवक्रभयो देहः’।

भगवत्पाद् शंकराचार्य जी द्वारा सौन्दर्य लहरी में श्रीयंत्र का स्वरूप इस प्रकार बताया गया है-

चतुर्भि श्रीकंठे शिवयुवतिभिः पंचभिरपि

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त्रिरेखाभि सांर्ध-तव शरणकोणाः परिणताः’

श्रीयंत्र श्रीविद्या का ज्यामितीय स्वरूप है। सम्प्रदायभेद (हादि, कादि तथा सादि), समयाचार (समयमत तथा कौलमत) पूजाक्रम तथा गुरूपरम्पराओं के अनुसार श्री यंत्र की रचना में किंचित अन्तर पाया जाता है जिसका संक्षिप्त विवरण दिया जा रहा है-

(1) सृष्टिक्रम के अनुसार रचित श्रीयंत्र

सृष्टिक्रम के अनुसार रचित श्रीयंत्र की उपासना समयमत के अनुयायी साधक करते है। श्री शंकराचार्य इसी मत के अनुयायी थे। इस यंत्र में सबसे भीतरी वृत्त के अन्दर चारों तरफ 9-त्रिकोण होते हैं। जिनमें से ऊर्ध्वमुखी 5-त्रिकोण शक्ति के द्योतक हैं जिनको ‘शिवयुवती’ कहा गया है तथा अधोमुखी 4-त्रिकोण शिव के द्योतक हैं जिनको ‘श्रीकंठ’कहा गया है। यही 9-त्रिकोण पिन्ड-ब्रह्मान्ड की ऐक्यता स्थापित करते हैं तथा इन्हीं 9-त्रिकोणों को मिलाकर वृत्त के अन्दर 43-त्रिकोण बन जाते हैं। ब्रह्मान्ड के सन्दर्भ में 5-शक्ति त्रिकोण पंचभूत, पंचतन्मात्रा, पंचकर्मेन्द्रिय,पंचज्ञानेन्द्रिय तथा पंचप्राण के द्योतक हैं जबकि शरीर के सन्दर्भ में यही त्वक्, असृक, मांस, मेद तथा अस्थि के द्योतक हैं। इसी प्रकार 4-शिवत्रिकोण ब्रह्मान्ड के सन्दर्भ में मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार का निरूपण करते हैं तो शरीर के सन्दर्भ में मज्जा, शुक्र, प्राण तथा जीव का निरूपण करते हैं। स्पष्ट है कि श्रीयंत्र के सन्दर्भ में पिन्ड-ब्रह्मान्ड की ऐक्यता का विवरण अत्यन्त दुरूह तथा विस्तृत है। जिज्ञासु साधक को यह ज्ञान आगमग्रन्थों तथा श्रीगुरूदेव से प्राप्त कर लेना चाहिए। इस सन्दर्भ में योगिनीहृदय तंत्र का बचन दृष्टव्य है-

‘त्रिपुरेशी महायंत्रं -पिन्डात्मक मीश्वरि

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पिन्ड-ब्रह्मान्डयोज्ञानं-श्री चक्रस्य विशेषतः

(2) संहारक्रम के अनुसार रचित श्रीयंत्र

इस क्रम के अनुसार निर्मित श्री यंत्र में 5-शक्ति त्रिकोण अधोमुखी तथा 4-शिवत्रिकोण ऊर्ध्वमुखी होते हैं। इस यंत्र की पूजोपासना कौलमतानुयायी साधक करते हैं। जो सामान्यतया ग्रहस्थ साधक होते हैं।

श्रीयंत्र के स्वरूप, श्रीयंत्र की उपासना पद्धतियों तथा उसकी पूजा-उपासना से प्राप्त सुफलों का विस्तृत विवरण त्रिपुरोपनिषद्, त्रिपुरातापिनी उपनिषद्, तंत्रराज तंत्र,रूद्रयामल तंत्र, भैरवयामल तंत्र, कामकला विलास तथा ब्रह्मान्डपुराणान्तर्गत श्री ललितासहस्रनाम तथा त्रिशतीस्तव में दिया गया है।

।। श्रीयंत्र के 9 चक्रों का विवरण।।

श्रीयंत्र स्थित 9-चक्रों के विषय में ‘रूद्रयामल तंत्र’ में बताया गया है –

बिन्दु-त्रिकोण, बसुकोण दशारयुग्म

मन्वस्र नागदल संयुत षोडशारम्

वृत्तत्रयंत्र धरणीसदन त्रयंच

श्री चक्रभेत दुदितं परदेवतायाः

इस प्रकार श्रीयंत्र में निम्नलिखित 9-चक्र होते हैं –

(1) बिन्दु-सर्वानन्दमय चक्र।

(2) त्रिकोण-सर्वसिद्धिप्रद चक्र।

(3) आठत्रिकोण (अष्टार)-सर्वरोगहर चक्र।

(4) आन्तरिक 10-त्रिकोण (अन्तर्दशार)-सर्वरक्षाकर चक्र।

(5) बाह्य 10-त्रिकोण (वहिर्दशार)-सर्वार्थसाधक चक्र।

(6) 14-त्रिकोण (चतुर्दशार)-सर्वसौभाग्यदायक चक्र।

(7) 8-दलों का कमल (अष्टदलपद्म)-सर्वसंक्षोभण चक्र।

(8) 16-दलों का कमल (षोडशदल पद्म)-सर्वाशापरिपूरक चक्र।

(9) चतुरस्र (भूपुर)-त्रैलोक्यमोहन चक्र।

श्रीयंत्र स्थित उपरोक्त 9-चक्रों के दिव्य नामों से ही इसकी पूजोपासना से प्राप्त होने वाले सुफलों का परिचय मिल जाता है।

आगम ग्रन्थों में श्रीयंत्र के विषय में विस्तृत विवरण देते हुए बताया गया है-

चतुर्भि शिवचक्रैश्च, शक्तिचक्रैश्च पंचभिः

नवचक्रैश्च ससिद्धं-श्रीचक्रं शिवयोर्वपुः

(5-शक्तित्रिकोणों तथा 4-शिवत्रिकोणों से युक्त श्रीयंत्र साक्षात् शिव जी का ही शरीर है)

श्रीचक्र स्थित शक्तिचक्रों तथा शिवचक्रों का विवरण देते हुए ब्रह्मान्डपुराण (श्री ललिता त्रिशती) में बताया गया है कि –

त्रिकोण अष्टकोणं च-दशकोणद्वयं तथा

चतुर्दशारं चैतानि-शक्तिचक्राणि पंच च

(त्रिकोण, अष्टकोण, अन्तर्दशार, बहिर्दशार तथा चतुर्दशार शक्तिचक्र हैं)

बिन्दुश्चाष्टदलं पद्मं-पद्मं षोडशपत्रकम्

चतुरस्रं च चत्वारि-शिवचक्राण्यनुक्रमात्

(बिन्दु, आठदलों वाला कमल, सोलह दलोंवाला कमल तथा भूपुर शिवचक्र हैं)

पुनश्च-

त्रिकोणरूपिणी शक्तिः-बिन्दुरूप परशिवः

अविनाभाव सम्बद्धं-यो जानाति स चक्रवित्

(वही साधक ज्ञानी है जो यह जानता है कि श्रीयंत्र स्थित त्रिकोण ही शक्ति है तथा बिन्दु ही शिव-स्वरूप है)

श्रीयंत्र को सृष्टि, स्थिति तथा संहारचक्रात्मक भी माना गया है। इसके बिन्दु, त्रिकोण तथा अष्टार को सृष्टिचक्रात्मक,अन्तर्दशार, वहिर्दशार तथा चतुर्दशार को स्थिति चक्रात्मक तथा अष्टदल, षोडशदल तथा भूपुर को संहारचक्रात्मक मानते हैं। इसीलिए जिस क्रम (उपासनापद्धति) में श्रीयंत्र की पूजा बिन्दु से आरम्भ होकर भूपुर में समाप्त होती है उस क्रम को सृष्टिक्रम कहते हैं तथा जिस क्रम में श्रीयंत्र की पूजा भूपुर से आरम्भ होकर बिन्दु में समाप्त होती है उसे संहारक्रम कहा जता है। कौलमतानुयायी ग्रहस्थ साधकों में इसी संहारक्रम से पूजा (नवावरणपूजा) करने की परम्परा है। श्रीयंत्र के चक्रों में एक विशेष विधि तथा क्रम से विभिन्न वर्णाक्षर (स्वर तथा व्यंजन) लिखे रहते हैं। यही मातृकाक्षर श्रीयंत्र की आत्मा तथा प्राण हैं जिनके प्रभाव से श्रीयंत्र उपासना परमसिद्धिदायक बन जाती है।

।।श्रीयंत्र के वृत्तों तथा चतुरस्र की रचना।।

श्रीयंत्रान्तर्गत वृत्तों की संख्या तथा चतुरस्र की रेखाओं के विषय में विभिन्न गुरूपरम्पराओं तथा उपासनाक्रमों में मतभेद पाया जाता है। सामान्यतया चतुर्दशार के पश्चात् एक वृत्त तथा अष्टदलकमल के पश्चात भी एक वृत्त बनाया जाता है। प्रमुख मतभेद षोडशदल कमल के बाद बनाए जाने वाले वृत्तों की संख्या के बारे में पाया जाता है। कौलमतानुसार षोडशदलों के शीर्ष से केवल एक ही वृत्त दिया जाता है जबकि अन्य गुरूपरम्पराओं में इस वृत्त के बाद एक अतिरिक्त वृत्त (कुल 2-वृत्त) तो कहीं 2-अतिरिक्त वृत्त (कुल 3-वृत्त) दिए जाते हैं। इसी प्रकार भूपुर की रेखाओं की संख्या के बारे में भी मतभेद पाया जाता है। सामान्यतया 3-रेखाओं तथा 4-द्वारों वाला चतुरस्र ही पाया जाता है। कोई आचार्य 4-रेखाओं युक्त 4-द्वारों वाला चतुरस्र भी बनाते हैं। कौलमतानुदायी भूपुर की बाहरी रेखा में अणिमादि 10-सिद्धियों, मध्यरेखा में ब्राह्मी आदि 8-मातृकाओं तथा अन्दर की रेखा में सर्वसंक्षोभिण्यादि 10-मुद्राशक्तियों अर्थात् कुल 28-शक्तियों की पूजा करते हैं जबकि 4-रेखाओं वाले चतुरस्र को मानने वाले इन्द्रादि 10-दिक्पालों का भी यहीं पर पूजन करते हैं। मतभेद चाहे कुछ भी हो अपनी गुरूपरम्परा के अनुसार श्रीयंत्र का पूजन-अर्चन करने से साधक को अभीष्ट सिद्धि प्राप्त होती ही है।

।। श्रीयंत्र उपासना में पिन्ड व्रह्मान्ड की ऐक्यता।।

श्रीविद्या के उपासक श्रीयंत्र को मन का द्योतक मानते हैं। अद्वैत वेदान्ती श्रीचक्र को मन की सृष्टि मानते हैं। श्रीचक्र को बनाने वाले बिन्दु तथा त्रिकोण आदि चक्र मन और उसकी विभिन्न वृत्तियां ही हैं। यह अत्यन्त रहस्यमय कथन है जिसका विस्तार यहाँ पर नहीं किया जा सकता है। श्रीचक्र का प्रत्येक आवरण (कुल-9 आवरण) मनुष्य की मानसिक दशा को निरूपण करता है तथा विभिन्न चक्रों में पूजित शक्तियाँ भी मन की विभिन्न वृत्तियों का ही निरूपण करती हैं। मानव शरीर में विद्यमान समस्त नाड़ी मन्डल,उनकी समस्त क्रियाओं, उनके द्वारा अनुभव किए जाने वाले सुख-दुख, मनुष्य की समस्त आन्तरिक तथा बाह्य भावनाओं का श्रीचक्र के विभिन्न आवरणों की विभिन्न शक्तियों के साथ विलक्षण सम्बन्ध स्थापित किया गया है। इस प्रकार की ऐक्यता का संक्षिप्त दिग्दर्शन कराया जा रहा है।

(1) बिन्दु चक्र (महाबिन्दु)

श्रीयंत्र में बिन्दुचक्र ही प्रधानचक्र हैं। यहीं पर श्री कामेश्वर शिव के साथ श्री कामेश्वरी (माँ त्रिपुरसुन्दरी) नित्य आनन्दमय अवस्था में विद्यमान रहती है। इनके पूजन से साधक को परमानन्दरूप ब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है तथा सविकल्प समाधि सिद्ध हो जाती है। इस चक्र की आवरण देवी केवल ‘परदेवता’ ही है।

(2) सर्वसिद्धिप्रद चक्र (त्रिकोण)

इस त्रिकोणचक्र के 3-कोणों को कामरूप, पूर्णागिरि तथा जालन्धर पीठ माना जाता है तथा मध्यबिन्दु में ओड्याण पीठ स्थित है। इन पीठों की अधिष्ठात्री देवियां कामेश्वरी,बज्रेश्वरी तथा भगमालिनी हैं जो प्रकृति, महत् तथा अहंकार की द्योतक है।

(3) सर्वरोगहर चक्र (अष्टार)

अष्टार के 8-त्रिकोणों की अधिष्ठात्री देवियां वशिनी आदि8-वाग्देवता हैं जो क्रमशः शीत से तम तक की स्वामिनी है।

(4) सर्वरक्षाकरचक्र (अन्तर्दशार)

इस चक्र के 10-त्रिकोणों की अधिष्ठात्री सर्वज्ञा आदि 10-देवियां है जो रेचक से मोहक तक की स्वामिनी है।

(5) सर्वार्थसाधकचक्र (वहिर्दशार)

इस चक्र के 10-कोणों की अधिष्ठात्री सर्वसिद्धिप्रदा आदि10-देवियां है जो 10-प्राणों की स्वामिनी है।

(6) सर्वसौभाग्यदायक चक्र (चतुर्दशार)

इस चक्र के 14-त्रिकोणों की अधिष्ठात्री सर्वसंक्षोभिणी आदि 14-देवियां हैं जो अलम्बुषा से सुषुम्ना तक 14-नाडि़यों की स्वामिनी है।

(7) सर्वसंक्षोभण चक्र (अष्टदल कमल)

इस चक्र के 8-दलों की अधिष्ठात्री अंनगकुसुमा आदि 8-शक्तियां हैं जो बचन से लेकर उपेक्षा की बुद्धियों की स्वामिनी है।

(8) सर्वाशापरिपूरकचक्र (16-दलों वाला कमल)

इस चक्र के 16-कमलदलों की अधिष्ठात्री कामाकर्षिणी आदि 16-शक्तियां हैं जो मन, बुद्धि से लेकर सूक्ष्मशरीर तक की स्वामिनी है।

(9) चतुरसचक्र (भुपूर)

इस चक्र में 3 अथवा 4-रेखाऐं मानी जाती है। यदि 3-रेखाऐं मानी जायें तो इन पर 10-मुद्राशक्तियां, 8-मातृकाऐं तथा 10-सिद्धियां स्थित हैं। यदि 4-रेखाऐं मानी जायें तो इनमें इन्द्रादि 10-दिग्पाल भी सम्मिलित हो जाते हैं। सर्वसंक्षोमिणी आदि 10-मुद्राशक्तियां 10-आधारों की द्योतक है। ब्राह्मी आदि 8-मातृकाऐं काम-क्रोधादि की द्योतक हैं। आणिमादि 10-सिद्धियां 9-रसों तथा भाग्य की द्योतक हैं। इन्द्र आदि 10-दिक्पालों की पूजा का उद्देश्य साधक की रक्षा करना तथा उसके समस्त बिघ्नों का निवारण करना होता है। श्री ललिता (पंचदशी) के उपासक श्री यंत्र के 9-चक्रों में उपरोक्तानुसार नित्य पूजन-अर्चन करते हैं। इसे नवावरणपूजा कहा जाता है। पूर्णाभिषेक के पश्चात् महाषोडशी (महात्रिपुरसुन्दरी) के उपासकों के लिए नवावरण पूजा के अतिरिक्त पंचपंचिका पूजा, षड्दर्शन विद्या, षडाधारपूजा तथा आम्नायसमष्टि पूजा करने का भी निर्देश हैं। इस पूजा को करने से उपासक को यह ज्ञान प्राप्त हो जाता है कि असंख्य देवी-देवता केवल एक पराशक्ति के ही बाहरीरूप हैं। इसी प्रकार षडाम्नायों के 7-करोड़ महामंत्र भी परब्रह्म स्वरूपिणी महाशक्ति का ही गुणगान करते हैं। वास्तव में श्रीचक्र पूजा का उद्देश्य आत्मा का ब्रह्म के साथ एकता करने का निरंतर अभ्यास करने के साथ ही ‘तत्वमसि’ एवं ‘अहंब्रह्मास्मि’ की भावना दृढ़ करके द्वैत भावना को नष्ट करते हुए ब्रहमानन्द की प्राप्ति करना होता है।

।। श्रीयंत्र दर्शन एवं पूजन का माहात्म्य।।

श्रीयंत्र श्री महात्रिपुरसुन्दरी का जीता-जागता साकार स्वरूप ही है। रूद्रयामल तंत्र में श्रीयंत्र दर्शन से प्राप्त होने वाले पुण्य तथा सुफलों का वर्णन करते हुए कहा गया है –

सम्यक् शतक्रतून कृत्वा-यत्फलं समवाप्नुयात्

तत्फलं लभते भक्त्या-कृत्वा श्रीचक्र दर्शनात्

महाषोडश दानानि

सार्धत्रिकोटि तीर्थेषु-स्नात्वा यत्फल मश्नुते

तत्फलं लभते भक्त्या-कृत्वा श्रीचक्र दर्शनम्

(महानयज्ञों का आयोजन करके, नाना प्रकार के दान-पुण्य करके तथा करोड़ों तीर्थों में स्नान करने से जो पुण्य तथा सुफल प्राप्त होते हैं वह केवल श्रीयंत्र के दर्शन करने से ही प्राप्त हो जाते हैं।)

श्रीयंत्र का चरणामृत (श्रीयंत्र के ऊपर अर्पितजल) पान करने से प्राप्त सुफलों का वर्णन करते हुए शास्त्र कहते हैं-

गंगा पुष्कर नर्मदाच यमुना-गोदावरी गोमती

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तीर्थस्नान सहस्रकोटि फलदं-श्रीचक्र पादोदकं

(गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, गोमती तथा सरस्वती आदि पवित्रनदियों, पुष्कर, गया, बद्रीनाथ, प्रयागराज, काशी,द्वारिका तथा समुद्रसंगम आदि तीर्थों में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है उससे हजारों-करोड़ अधिक पुण्य केवलमात्र श्रीयंत्र का चरणोदक पीने से प्राप्त हो जाता है।)

पुनश्च,

अकालमृत्यु हरणं-सर्वव्याधिविनाशनं

देवी पादोदकं पीत्वा-शिरसा धारयाम्यहं’।

(श्रीयंत्र का चरणोदक अकालमृत्यु का हरण करता है तथा समस्त व्याधियों का नाश करता है। अतः इसे पीना चाहिए तथा शिर में भी धारण करना चाहिए)

शास्त्र यह भी बताते हैं-

प्रथमं काय शुद्यंर्थ-द्वितीयं धर्मसंग्रहं

तृतीयं मोक्षप्राप्त्यर्थ एवं तीर्थं त्रिधापिवेत्

(प्रत्येक साधक को अपनी कायाशुद्धि के लिए, धर्मसंग्रह के लिए तथा मोक्षप्राप्ति के लिए इस चरणामृत को 3-बार पीना चाहिए।)

शास्त्रों तथा श्रीगुरूजनों द्वारा निर्देश दिया गया है कि श्री सत्गुरूओं द्वारा सुप्रतिष्ठित तथा साधक द्वारा कुलद्रव्यों द्वारा कुलक्रमानुसार सुपूजित श्रीयंत्र श्री माँ का नित्यजागृत शरीर की भांति हो जाता है। अतः कोई भी अदीक्षित व्यक्ति (शक्तिपात रहित) जिसने विभिन्न न्यासों के अतिरिक्त‘महाषोढा’ तथा ‘महाशक्ति’ न्यास का अभ्यास न किया हुआ हो, यदि अत्यन्त विनम्रभाव से तथा परमभक्तिपूर्वक भी, श्रीयंत्र का दर्शन करता है तो उसकी आयु (उम्र) का हरण हो जाता है। यह भी श्रीपराम्वा की इच्छा ही है कि वर्तमान समय में ऐसे सिद्ध श्रीयंत्रों के दर्शन प्राप्त हो पाना स्वतः ही कठिन हो गया है।

जय अम्बे जय गुरुदेव

Symptoms of Sadhana Progression

*साधना करतें समय साधक में विकसित होतें लक्षण ।*

● शारीरिक दर्द, विशेष रूप से गर्दन, कंधे और पीठ में। यह आपके आध्यात्मिक डीएनए स्तर पर गहन परिवर्तन का परिणाम है क्योंकि “ईश्वरीय बीज” जागता है।यह साधना करतें रहने से ठिकहो जाएगा

● बीना किसी कारण के लिए गहरी आंतरिक उदासी महसूस करना यह अनुभव से आप अपने अतीत (इस जीवनकाल और अन्य) कि दुखद घटनाओं से से मुक्त होने पर अनुभव करते हैं और इससे अकारण दुःख की भावना पैदा होती है । यह कुछ ऐसा हैं जैसे कई वषों तक अपनें घर को छोङ कर नयें घर में जाते है और पुराने घरों की यादें, ऊर्जा और अनुभवों को छोड़ने से जो उदासी अनुभव होतीं है। यह भी लगातार साधना करने से दुर हो जाएगा।बिना किसी कारण के लिए आँसू प्रवाह होना । यह शरीर और मन दोनो के लिए अच्छा और स्वास्थदायक है । यह पुरानी ऊर्जा को भीतर से रिलीज करने में मदद करता है। साधना करते जाएगा।

● वर्तमान परिवार के लोगों से अपनें को अलग महसुस करना उदासीनता आना ।हम पारिवारीक रिश्तों में अपनें पुराने कर्मों के कारण (लेन-देन) से जुड़े हुए हैं। जब आप कर्मी चक्र से निकलते हैं,तो पुराने रिश्तों के बंधनो से मुक्त होने लगते हैं। यह अनुभव हैं जैसे कि आप अपने परिवार और दोस्तों से दूर रह रहे हैं। यह समय भी गुजर जाएगा। समय के बाद, यदि आप उपयुक्त हैं तो आप उनके साथ एक नया रिश्ता विकसित कर सकते हैं। हालांकि, रिश्ते को एक नई ऊर्जा के आधार पर निभाया जाएगा बिना कार्मिक संलग्नकता के ।

● नींद का अकारण आधी रात को खुल जाना ।यह संभव है कि आप (2:00 AM- 4:00 AM) पूर्वाह्न के बीच कई रातों को जगाएंगे। तुम्हारे भीतर बहुत काम चल रहा है, और यह आपको अक्सर गहरी “श्वास” लेने के लिए जागने का कारण बनता है।कोइ चिंता नहीं। अगर आप वापस सोने के लिए नहीं जा सकते हैं, उठकर बिस्तर पर बैठकर कुछ करे गोलङन बुक पढें या मन मे सनकिरतन कर सकते हैं साधना कर सकतें हैं अच्छे सकारात्मक विचार मन में लाये इत्यादि । यह भी गुजर जाएगा।

● ❝इंटेंस सपने ।इनमें आप युद्ध और लड़ाई के सपने, राक्षस के पीछे भागने या ङरावने सपने शामिल हो सकते हैं। आप सचमुच में पुरानी ऊर्जा को भीतर से रीलिज़ कर रहे हैं, और अतीत की ये ऊर्जा अक्सर युद्ध के रूप में दर्शायी जाती है, ङर कर भागने के जैसे इत्यादि । यह भी गुजर जाएगा।* *भौतिक असंतोष ।कभी-कभी आप बहुत निराश महसूस करेंगे। आपको महसूस होगा कि आप जमीन पर दो फुट नहीं चल सकते हैं, या आप दो दुनियाओं के बीच चल रहे हैं। ऐसा अनुभव जब आपकी चेतना नई ऊर्जा में परिवर्तित होने लगतीं हैं तब ऐसा महसुस होता हैं । प्रकृति में अधिक समय व्यतीत करनेे से नई ऊर्जा का अपने भीतर निर्माण होने में मदद मिलती हैं । यह भी गुजर जाएगा।

● “स्वयं बाते करना।”अकसर आप अपने आप को अपने स्वयं से बात करतें महसूस करेंगे । आप अचानक महसूस करेंगे कि आप पिछले 30 मिनट से अपने आप से चिल्ला रहे हैं यह आपके अस्तित्व में होने वाले संचार का एक नया स्तर है, कई बार आप हिमशैल की नोकपर स्वयं को बात करते हुए अनुभव कर रहे होगें।आपकी यह बातचीत बढ़ेगी, और वे अधिक द्रव, अधिक सुसंगत और अधिक व्यावहारिक बन जाएंगे । आपको लगने लगेगा कि आप पागल होते जा रहे हैं, पर वास्तव में यह चेतना का विकास हैं आप नई ऊर्जा में आगे बढ़ने की प्रक्रिया में हैं।

● अकेलेपन की भावना ।यह भावना लोगों के साथ होने पर भी अनुभव होती हैं । कई लोगों के होने पर भी आप अपनें आप को अकेले महसूस कर सकते हैं और लोगों कि उस भीङ से वहाँ से भाग जाये ऐसा भी ,महसूस कर सकतें हैं ।यह इसलिए अनुभव होता हैं जब हम निरंतर एक पवित्र और साधना मार्ग पर चल रहे हैं।अकेलेपन की भावनाओं के कारण आपको चिंता होती है, इस समय दूसरों से बातचीत करना या नयें संबंधबनाने में मुश्किल अनुभव करेगें । अकेलेपन की भावनाएं इस तथ्य से भी जुड़ी हुई हैं कि आपकी मार्गदर्शिकाएँ (spiritual Guids)समाप्त हो चुकी हैं। वे आपके सभी जीवन कालों में आपके सभी यात्रा पर रहे हैं। यह उनके लिए दूर करने का समय था ताकि आप अपनी जगह अपने देवत्व से भर सकें। यह भी गुजर जाएगा। भीतर का शून्य अपने ही सच ईश्वर की प्रेम और ऊर्जा से भर जाएगा

● जुनून का मौका ।इस अनुभव पर आप पूरी तरह से अपनी असहमति महसूस कर सकते हैं, कुछ भी करने की इच्छा नहीं रखते। यह ठीक है, और यह प्रक्रिया का सिर्फ एक हिस्सा है इस समय के लिए “कोई बात नहीं है।” इस पर खुद से लड़ाई मत करो, क्योंकि यह भी पारित होगा।यह कंप्यूटर को रिबूट करने के समान है आपको परिष्कृत नए सॉफ़्टवेयर को लोड करने के लिए समय की थोड़ी अवधि के लिए शट डाउन करना होगा, या इस मामले में नई दिव्य ऊर्जाओ के भीतर सुरक्षित करने के लिए होगा ।

● घर जाने के लिए एक गहन इच्छा ।यह अनुभव शायद किसी भी परिस्थितियों में सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण है। ग्रह छोड़ने और अपनें वास्तविक घर पर वापस जाने की एक गहरी और भारी इच्छा का अनुभव है ।यह कोई “आत्मघाती” अनुभव नहीं है नाहीं यह किसी प्रकार के क्रोध या हताशा पर आधारित है। आप इसे एक बड़ा सौदा नहीं करनाचाहते हैं या अपने आप को या अन्य के लिए नाटक का कारण नहीं बनाते हैं। आप का एक शांत ऊर्जा है जो घर जाना चाहती है। इसके लिए मूल कारण काफी आसान है। आपने अपना कर्मक चक्र पूरा कर लिया है आपने इस जीवनकाल के लिए अपना अनुबंध पूरा कर लियाहै ।आप इस भौतिक शरीर में अभी भी एक नया जीवनकाल शुरू करने के लिए तैयार हैं। इस संक्रमण प्रक्रिया के दौरान, आपको यह अहसास होजाता है कि आप कभी अकेले नहीं थे ।

●❝क्या आप पृथ्वी पर दूसरे कर्तव्य के दौरे के लिए तैयार हैं? क्या आप नई ऊर्जा में जाने की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हैं? अगर हां, वास्तव में आप अभी घर जा सकते हैं। लेकिन आप ये बहुत दूर आ गए हैं, और कई के बाद, बहुत से जन्मों के बाद फिल्म की समाप्ति से पहले ही यह शर्म की बात होगी।इसके अलावा, यहां आत्मा की जरूरत है ताकि आप दूसरों को इस नई ऊर्जा में परिवर्तित कर सकें। उन्हें आपके जैसे ही एक मानव गाइड की आवश्यकता होगी, जिन्होंने पुरानी ऊर्जा से नई यात्रा की है।जिस पथ पर आप अभी चल रहे हैं, वह आपको नए दैवीय मानव के शिक्षक बनने के लिए सक्षम करने के लिए अनुभव प्रदान करता है।जैसा कि अकेला और अंधेरा जैसा आपकी यात्रा कभी-कभी हो सकती है, याद रखें कि आप अकेले नहीं हैं ।

आपका गुरु, आपके आधात्मिक गाईड, परम पिता परमेश्वर हमेशा आपके साथ हैं।

जगदगुरु श्री आदि शंकराचार्य की जन्म जयंती

आज सनातन धर्म के अर्वाचीन जगदगुरु श्री आदि शंकराचार्य की जन्म जयंती हैं वैशाख शुक्ल पंचमी, पुनर्वसु नक्षत्रे युधिष्ठिर संवत २६३१, कली संवत २५९३, १६ एप्रिल ५०९ BC. अद्वैतवादके प्रणेता महान ज्ञानी,एक पाठी (सतावधानी) और उपासक.

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“निर्वाण-षटकम्”

जब आदि गुरु शंकराचार्य जी की अपने गुरु गोविंदपदाचार्य से प्रथम भेंट हुई तो उनके गुरु ने बालक शंकर से उनका परिचय माँगा।

बालक शंकर ने अपना परिचय किस रूप में दिया ये जानना ही एक सुखद अनुभूति बन जाता है।

यह परिचय ही आगे चलकर ‘निर्वाण-षटकम्’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

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मनो बुद्धि अहंकार चित्तानि नाहं

न च श्रोत्र जिव्हे न च घ्राण नेत्रे।

न च व्योम भूमि न तेजो न वायु:

चिदानंद रूपः शिवोहम शिवोहम।।१।।

मैं मन, बुद्धि, अहंकार और स्मृति नहीं हूँ, न मैं कान, जिह्वा, नाक और आँख हूँ। न मैं आकाश, भूमि, तेज और वायु ही हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ।

न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायुः

न वा सप्तधातु: न वा पञ्चकोशः।

न वाक्पाणिपादौ न च उपस्थ पायु

चिदानंदरूप: शिवोहम शिवोहम।।२।।

न मैं मुख्य प्राण हूँ और न ही मैं पञ्च प्राणों (प्राण, उदान, अपान, व्यान, समान) में कोई हूँ, न मैं सप्त धातुओं (त्वचा, मांस, मेद, रक्त, पेशी, अस्थि, मज्जा) में कोई हूँ और न पञ्च कोशों (अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनंदमय) में से कोई, न मैं वाणी, हाथ, पैर हूँ और न मैं जननेंद्रिय या गुदा हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ।

न मे द्वेषरागौ न मे लोभ मोहौ

मदोनैव मे नैव मात्सर्यभावः।

न धर्मो नचार्थो न कामो न मोक्षः

चिदानंदरूप: शिवोहम शिवोहम।।३।।

न मुझमें राग और द्वेष हैं, न ही लोभ और मोह, न ही मुझमें मद है न ही ईर्ष्या की भावना, न मुझमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ही हैं, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ।

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खं

न मंत्रो न तीर्थं न वेदों न यज्ञः।

अहम् भोजनं नैव भोज्यम न भोक्ता

चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम।।४।।

न मैं पुण्य हूँ, न पाप, न सुख और न दुःख, न मन्त्र, न तीर्थ, न वेद और न यज्ञ, मैं न भोजन हूँ, न खाया जाने वाला हूँ और न खाने वाला हूँ, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ।

न मे मृत्युशंका न मे जातिभेद:

पिता नैव मे नैव माता न जन्म।

न बंधू: न मित्रं गुरु: नैव शिष्यं

चिदानंदरूप: शिवोहम शिवोहम।।५।।

न मुझे मृत्यु का भय है, न मुझमें जाति का कोई भेद है, न मेरा कोई पिता ही है, न कोई माता ही है, न मेरा जन्म हुआ है, न मेरा कोई भाई है, न कोई मित्र, न कोई गुरु ही है और न ही कोई शिष्य, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ।

अहम् निर्विकल्पो निराकार रूपो

विभुव्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम ।

सदा मे समत्वं न मुक्ति: न बंध:

चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम।।६।।

मैं समस्त संदेहों से परे, बिना किसी आकार वाला, सर्वगत, सर्वव्यापक, सभी इन्द्रियों को व्याप्त करके स्थित हूँ, मैं सदैव समता में स्थित हूँ, न मुझमें मुक्ति है और न बंधन, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ।

इति श्रीमद्जगद्गुरु शंकराचार्य विरचितं निर्वाण-षटकम सम्पूर्णं।।

“ॐ नमः शिवाय”

‘शंकरो शंकर: साक्षात्’।

एक संन्यासी बालक, जिसकी आयु मात्र 7 वर्ष थी, गुरुगृह के नियमानुसार एक ब्राह्मण के घर भिक्षा माँगने पहुँचा। उस ब्राह्मण के घर में भिक्षा देने के लिए अन्न का दाना तक न था। ब्राह्मण पत्नी ने उस बालक के हाथ पर एक आँवला रखा और रोते हुए अपनी विपन्नता का वर्णन किया। उसकी ऐसी अवस्था देखकर उस प्रेम-दया मूर्ति बालक का हृदय द्रवित हो उठा। वह अत्यंत आर्त स्वर में माँ लक्ष्मी का स्तोत्र रचकर उस परम करुणामयी से निर्धन ब्राह्मण की विपदा हरने की प्रार्थना करने लगा। उसकी प्रार्थना पर प्रसन्न होकर माँ महालक्ष्मी ने उस परम निर्धन ब्राह्मण के घर में सोने के आँवलों की वर्षा कर दी। जगत् जननी महालक्ष्मी को प्रसन्न कर उस ब्राह्मण परिवार की दरिद्रता दूर करने वाला, दक्षिण के कालाड़ी ग्राम में जन्मा वह बालक था- ‘’शंकर’’, जी आगे चलकर ‘‘जगद्गुरु शंकराचार्य’’ के नाम से विख्यात हुआ। इस महाज्ञानी शक्तिपुंज बालक के रूप में स्वयं भगवान शंकर ही इस धरती पर अवतीर्ण हुए थे। इनके पिता शिवगुरु नामपुद्रि के यहाँ विवाह के कई वर्षों बाद तक जब कोई संतान नहीं हुई, तब उन्होंने अपनी पत्नी विशिष्टादेवी के साथ पुत्र प्राप्ति की कामना से दीर्घकाल तक चंद्रमौली भगवान शंकर की कठोर आराधना की। आखिर प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और कहा- ‘वर माँगो।’ शिवगुरु ने अपने ईष्ट गुरु से एक दीर्घायु सर्वज्ञ पुत्र माँगा। भगवान शंकर ने कहा- ‘वत्स, दीर्घायु पुत्र सर्वज्ञ नहीं होगा और सर्वज्ञ पुत्र दीर्घायु नहीं होगा। बोलो तुम कैसा पुत्र चाहते हो?’ तब धर्मप्राण शास्त्रसेवी शिवगुरु ने सर्वज्ञ पुत्र की याचना की। औढरदानी भगवान शिव ने पुन: कहा- ‘वत्स तुम्हें सर्वज्ञ पुत्र की प्राप्ति होगी। मैं स्वयं पुत्र रूप में तुम्हारे यहाँ अवतीर्ण होऊँगा।’

कुछ समय के पश्चात ई. सन् 686 में वैशाख शुक्ल पंचमी (कुछ लोगों के अनुसार अक्षय तृतीया) के दिन मध्याकाल में विशिष्टादेवी ने परम प्रकाशरूप अति सुंदर, दिव्य कांतियुक्त बालक को जन्म दिया। देवज्ञ ब्राह्मणों ने उस बालक के मस्तक पर चक्र चिन्ह, ललाट पर नेत्र चिन्ह तथा स्कंध पर शूल चिन्ह परिलक्षित कर उसे शिव अवतार निरूपित किया और उसका नाम ‘शंकर’ रखा। इन्हीं शंकराचार्य जी को प्रतिवर्ष वैशाख शुक्ल पंचमी को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए श्री शंकराचार्य जयंती मनाई जाती है।

आचार्य शंकर का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी तिथि ई. सन् 788 को तथा मोक्ष ई. सन् 820 स्वीकार किया जाता है, परंतु सुधन्वा जो कि शंकर के समकालीन थे, उनके ताम्रपत्र अभिलेख में शंकर का जन्म युधिष्ठिराब्द 2631 शक् (507 ई०पू०) तथा शिवलोक गमन युधिष्ठिराब्द 2663 शक् (475 ई०पू०) सर्वमान्य है।

शंकराचार्य ने हिंदू धर्म को व्यवस्थित करने का भरपूर प्रयास किया। उन्होंने हिंदुओं की सभी जातियों को इकट्ठा करके ‘दसनामी संप्रदाय’ बनाया और साधु समाज की अनादिकाल से चली आ रही धारा को पुनर्जीवित कर चार धाम की चार पीठ का गठन किया जिस पर चार शंकराचार्यों की परम्परा की शुरुआत हुई।

चार प्रमुख मठ निम्न हैं:-

1. वेदान्त ज्ञानमठ, श्रृंगेरी (दक्षिण भारत)।

2. गोवर्धन मठ, जगन्नाथपुरी (पूर्वी भारत)

3. शारदा (कालिका) मठ, द्वारका (पश्चिम भारत)

4. ज्योतिर्पीठ, बद्रिकाश्रम (उत्तर भारत)

शंकराचार्य के चार शिष्य

1. पद्मपाद (सनन्दन)

2. हस्तामलक

3. मंडन मिश्र

4. तोटक (तोटकाचार्य)।

माना जाता है कि उनके ये शिष्य चारों वर्णों से थे।

ग्रंथ :

शंकराचार्य ने सुप्रसिद्ध ब्रह्मसूत्र भाष्य के अतिरिक्त ग्यारह उपनिषदों पर तथा गीता पर भाष्यों की रचनाएँ की एवं अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथों स्तोत्र-साहित्य का निर्माण कर वैदिक धर्म एवं दर्शन को पुन: प्रतिष्ठित करने के लिए अनेक श्रमण, बौद्ध तथा हिंदू विद्वानों से शास्त्रार्थ कर उन्हें पराजित किया। इनके अलावा भी शंकरचार्य जी ने अनेको ग्रंथ एवं भाष्य जंकल्याणार्थ लिखे।

दसनामी सम्प्रदाय :

शंकराचार्य से सन्यासियों के दसनामी सम्प्रदाय का प्रचलन हुआ। इनके चार प्रमुख शिष्य थे और उन चारों के कुल मिलाकर दस शिष्य हए। इन दसों के नाम से सन्यासियों की दस पद्धतियाँ विकसित हुई। शंकराचार्य ने चार मठ स्थापित किए थे।

दसनामी सम्प्रदाय के साधु प्राय:

गेरुआ वस्त्र पहनते, एक भुजवाली लाठी रखते और गले में चौवन रुद्राक्षों की माला पहनते। कठिन योग साधना और धर्मप्रचार में ही उनका सारा जीवन बितता है। दसनामी संप्रदाय में शैव और वैष्णव दोनों ही तरह के साधु होते हैं।

यह दस संप्रदाय निम्न हैं :

1.गिरि, 2.पर्वत और 3.सागर। इनके ऋषि हैं भ्रगु। 4.पुरी, 5.भारती और 6.सरस्वती। इनके ऋषि हैं शांडिल्य। 7.वन और 8.अरण्य के ऋषि हैं काश्यप। 9.तीर्थ और 10. आश्रम के ऋषि अवगत हैं।

हिंदू साधुओं के नाम के आगे स्वामी और अंत में उसने जिस संप्रदाय में दीक्षा ली है उस संप्रदाय का नाम लगाया जाता है, जैसे- स्वामी हरिहर तीर्थ।

शंकराचार्य का दर्शन :

शंकराचार्य के दर्शन को अद्वैत वेदांत का दर्शन कहा जाता है। शंकराचार्य के गुरु दो थे। गौडपादाचार्य के वे प्रशिष्य और गोविंदपादाचार्य के शिष्य कहलाते थे। शकराचार्य का स्थान विश्व के महान दार्शनिकों में सर्वोच्च माना जाता है। उन्होंने ही इस ब्रह्म वाक्य को प्रचारित किया था कि ‘ब्रह्म ही सत्य है और जगत माया।’ आत्मा की गति मोक्ष में है।

अद्वैत वेदांत अर्थात उपनिषदों के ही प्रमुख सूत्रों के आधार पर स्वयं भगवान बुद्ध ने उपदेश दिए थे। उन्हीं का विस्तार आगे चलकर माध्यमिका एवं विज्ञानवाद में हुआ। इस औपनिषद अद्वैत दर्शन को गौडपादाचार्य ने अपने तरीके से व्यवस्थित रूप दिया जिसका विस्तार शंकराचार्य ने किया। वेद और वेदों के अंतिम भाग अर्थात वेदांत या उपनिषद में वह सभी कुछ है जिससे दुनिया के तमाम तरह का धर्म, विज्ञान और दर्शन निकलता है।

जिन्हें ज्ञान हैं उन्हें घमंड कैसा जिन्हें घमंड हैं उन्हें ज्ञान कैसा।

Best of the Best

Among the names Lalitā is the best. Among the mantras, Shreevidyā is the best. And in Shreevidyā , the Kādividyā is the best(Sri Vidya Pashupat Kashi Parampara is Kadi Vidya). The Sreepura is the greatest among cities; among the Shreevidyā Upāsakās, Paramashiva is the prime devotee. One is attracted to Shreevidyā only in his last birth. Those who take to this worship will have no more births. It requires an extraordinary merit to get initiated in Shreevidyā. Can anyone see objects without vision or assuage their hunger without taking food? Similarly, no one can attain Siddhi, or please the deity, without the help of Shreevidyā.

श्री बाला त्रिपुर-सुन्दरी बहुचराजी (Shri Bala)

भगवतीश्रीबालाकाध्यान:

अरुण किरण जालै रंजीता सावकाशा,

विधृत जपवटीका पुस्तकाभीति हस्ता ।

इतरकर वराढय़ा फुल्ल कल्हार संस्था ,

निवसतु ह्यदी बाला नित्य कल्याण शीला ।।

(छवि: श्री राजराजेश्वरी पीठ, कड़ी, उत्तर गुजरात)

माँ श्री बाला त्रिपुर-सुन्दरी मां भगवती का बाला सुंदरी स्वरुप है. ‘दस महा-विद्याओ’ में तीसरी महा-विद्या भगवती षोडशी है, अतः इन्हें तृतीया भी कहते हैं । वास्तव में आदि-शक्ति एक ही हैं, उन्हीं का आदि रुप ‘काली’ है और उसी रुप का विकसित स्वरुप ‘षोडशी’ है, इसी से ‘षोडशी’ को ‘रक्त-काली’ नाम से भी स्मरण किया जाता है । भगवती तारा का रुप ‘काली’ और ‘षोडशी’ के मध्य का विकसित स्वरुप है । प्रधानता दो ही रुपों की मानी जाती है और तदनुसार ‘काली-कुल′ एवं ‘श्री-कुल′ इन दो विभागों में दशों महा-विद्यायें परिगणित होती हैं ।

भगवती षोडशी के मुख्यतः तीन रुप हैं –

(१) श्री बाला त्रिपुर-सुन्दरी या श्री बाला त्रिपुरा,

(२) श्री षोडशी या महा-त्रिपुर सुन्दरी तथा

(३) श्री ललिता त्रिपुर-सुन्दरी या श्री श्रीविद्या ।

आठ वर्षीया स्वरुप बाला त्रिपुर सुन्दरी का, षोडश-वर्षीय स्वरुप षोडशी स्वरुप तथा ललिता त्रिपुर सुन्दरी स्वरुप युवा अवस्था को माना है ।

श्री विद्या की प्रधान देवि ललिता त्रिपुर सुन्दरी है । यह धन, ऐश्वर्य भोग एवं मोक्ष की अधिष्ठातृ देवी है । अन्य विद्यायें को मोक्ष की विशेष फलदा है, तो कोई भोग की विशेष फलदा है परन्तु श्रीविद्या की उपासना से दोनों ही करतल-गत हैं ।

‘श्री बाला’ का मुख्य मन्त्र तीन अक्षरों का है और उनका पूजा-यन्त्र ‘नव-योन्यात्मक’ जिसे बाला यंत्रभी कहा गया है । अतः उन्हें ‘त्रिपुरा’ या ‘त्र्यक्षरी’ नामों से भी अभिहित करते हैं ।

‘श्री ललिता’ या ‘श्री श्रीविद्या’ का मुख्य मन्त्र पन्द्रह अक्षरों का होने से उनका नामान्तर ‘पञ्च-दशी’ भी है । इनका पूजा-यन्त्र ‘श्री-चक्र’ या ‘श्री-यन्त्र’ नाम से प्रसिद्ध है । ‘श्री षोडशी’ या ‘महा-त्रिपुर-सुन्दरी’ का मुख्य मन्त्र सोलह अक्षरों का है, उसी के अनुरुप उनका नाम है । पूजा यन्त्र ‘श्रीललिता’ – जैसा ही है ।

‘श्री ललिता’ एवं श्री ‘षोडशी’ के मन्त्रों में तीन ‘कूटों’ का समावेश है, जो क्रमशः ‘वाक्-कूट’, काम-कूट’ तथा ‘शक्ति-कूट’ नामों से प्रसिद्ध हैं । यहाँ ज्ञातव्य है कि पञ्चदशी के कूट-त्रय ‘क’, ‘ह′ या ‘स’ से प्रारम्भ होते हैं । अतः विभिन्न ‘कादि’, ‘हादि’ और ‘सादि’ – विद्या नाम से जाने जाते हैं ।

भगवती षोडशी से सम्बन्धित पूजा-यन्त्र ‘श्री-चक्र’ या ‘श्री-यन्त्र’ की विशेष ख्याति है । इस तरह का जटिल पूजा-यन्त्र अन्य किसी देवता का नहीं है । वह पिण्ड और ब्रह्माण्ड के समस्त रहस्यों का बोधक है । इसी से उसे ‘यन्त्र-राज’ या ‘चक्र-राज’ भी कहते हैं ।

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श्रीबाला त्रिपुरसुन्दरीनामकाअर्थ

त्रिपुरा शब्दकामहत्व ” :-

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बाला, बाला-त्रिपुरा, त्रिपुरा-बाला, बाला-सुंदरी, बाला-त्रिपुर-सुंदरी, पिण्डी-भूता त्रिपुरा, काम-त्रिपुरा, त्रिपुर-भैरवी, वाक-त्रिपुरा, महा-लक्ष्मी-त्रिपुरा, बाला-भैरवी, श्रीललिता राजराजेश्वरी, षोडशी, श्रीललिता महा-त्रिपुरा-सुंदरी, के अन्य भेद सभी श्री श्री विद्या के नाम से पुकारे जाते है | इन सभी विद्या की उपासना ऊधर्वाम्नाय से होती है |

बाला, बाला-त्रिपुरा और बाला-त्रिपुर-सुंदरी नामों से एक ही महा विद्या को सम्बोधित किया जाता है | किसी भी नाम से उपासना की जाये, उपासना तो जगन्माता की ही की जाती है | नारदीय संहिता मे लिखा है कि -‘वेद, धर्म-शास्त्र, पुराण, पञ्चरात्र आदि शास्त्रों मे एक ‘परमेश्वरी’ का वर्णन है, नाम चाहे भिन्न भिन्न हो|

किन्तु महा शक्ति एक ही है | कहीं मन्त्रोध्दार भेद से, कहीं आसन भेद से, कहीं सम्प्रदाय भेद से, कहीं पूजा भेद से, कहीं स्वरूप भेद से, कहीं ध्यान भेद से, “त्रिपुरा’ के बहुत प्रकार है | कहीं त्रिपुरा भैरवी, कहीं त्रिपुरा ललिता, कहीं त्रिपुर सुंदरी, कहीं इन नामों से पृथक, कहीं मात्र त्रिपुरा या बाला ही कही जाती है |

त्रिपुरा अर्थात तीन पुरों की अधीश्वरी | तीन पुरियों में जाने के मार्ग भी तीन है | ” मुक्ति’ के पञ्च प्रकार १. सालोक्य २. सामीप्य ३.सारूप्य ४.सायुज्य और ५. कैवल्य है | इनमे से सालोक्य का एक मार्ग है और कैवल्य का एक | शेष तीन सायुज्य, सारुप्य, और सामीप्य का एक अलग मार्ग है | इस प्रकार कुल तीन मार्ग हुए | त्रिविध मार्ग होने से पुरियां भी तीन है | तीन पुरियों की प्राप्ति अभीष्ट होने से पर-देवता को त्रिपुरा (त्रिपुर सुंदरी ) कहा गया है |

त्रिमूर्ति १. ब्रम्हा २. विष्णु ३. महेश्वर की सृष्टि से पूर्व जो विधमान थी तथा जो वेद त्रयी १.ऋग २.यजु: और ३. साम-वेद से पूर्व विद्यमान थी एवं त्रि-लोकों १. स्वर्ग २. पृथ्वी ३. पाताल के लय होने पर भी पुन: उनको ज्यो का त्यों बना देने वाली भगवती के नाम त्रिपुरा है |

विश्व भर मे तीन-तीन वस्तुओं के जितने भी समुदाय है वे सब भगवती बाला त्रिपुर सुंदरी के त्रिपुरा नाम में समाविष्ट है | अर्थात संसार में त्रि-संख्यात्मक जो कुछ है वे सभी वस्तुएं त्रिपुरा के तीन अक्षरों वाले नाम से ही उत्पन्न हुई है |

श्रीलघ्वाचार्य ने त्रि-संख्यात्मक वस्तुओं में कतिपय त्रि-वर्गात्मक वस्तुओं के नाम भी गिनायें है जैसे

तीन देवता १. ब्रह्मा २. विष्णु ३. महेश | देवता का अर्थ भी गुरु भी है |

तीन गुरु १. गुरु २.परम गुरु ३. परमेष्ठी गुरु |

तीन अग्नि १. गाहर्पत्य २. दक्षिनाग्नि ३. आहवनीय | अग्नि या ज्योति,

अत: तीन ज्योतियां १. ह्रदय-ज्योति २. ललाट-ज्योति ३. शिरो-ज्योति |

तीन शक्ति १. इच्छा शक्ति २. ज्ञान शक्ति ३. क्रिया शक्ति |

शक्ति से तीन देवियों का भी बोध होता है १. ब्रह्माणी २. वैष्णवी ३. रुद्राणी |

तीन स्वर १. उदात्त २. अनुदात्त ३. त्वरित अर्थात १. ‘अ’-कार २. ‘उ’-कार ३. बिन्दु |

तीन लोक १. स्वर्ग २. मृत्यु ३. पाताल | लोक शब्द से देहस्थ चक्र का अर्थ भी लिया जाता है ,

तीन चक्र १. आज्ञा २. शीर्ष ३. ब्रह्म-ज्ञान |

त्रि-पदी ( तीन स्थान ) १. जालन्धर-पीठ २. काम-रूप-पीठ ३. उड्डियान-पीठ |

पद शब्द से नाद शब्द का भी बोध होता है , तीन नाद १. गगनानंद २. परमानन्द ३. कमलानन्द |

त्रिपदी से तीन पदों वाली गायत्री भी ली जाती है | त्रि-पुष्कर ( तीन तीर्थ ) १. शिर २. ह्रदय ३. नाभि अथवा १. ज्येष्ठ पुष्कर २. मध्यम पुष्कर ३. कनिष्ठ पुष्कर |

त्रि-ब्रह्म ( तीन ब्रह्म ) १. इड़ा २. पिंगला ३. सुषुम्ना अर्थात १. अतीत २. अनागत ३. वर्तमान जैसे १. ह्रदय २. व्योम ३. ब्रह्म-रंध्र |

त्रयी वर्ण ( तीन वर्ण ) १. ब्राह्मण २. क्षत्रिय ३. वैश्य अथवा वर्ण शब्द से बीजाक्षरो का ग्रहण होता है १. वाग-बीज २. काम-बीज ३. शक्ति-बीज |

बाला शब्दका महत्व :-

जो अपने पुत्रों को तथा संसार को बल प्रदान करती है उसे बाला कहते है | सीधे-सादे अर्थ में यह समझना चाहियें की जो संसार के प्राणियों को बल प्रदान करती है वह “बाला” है बाला वही है जो हमारें समस्त अंगों को बल प्रदान करती है | नख से शिखा तक, रक्त से ओज तक, बुद्धि से बल तक जो प्राणी को बल प्रदान करती है वह शक्ति-मति अवश्य है , जिसके बिना प्राणी अपने को निस्सहाय समझता है |

” बाला ” अर्थात सर्व-शक्ति संपन्न, आदि माता | बाला का काम ही वृद्धि करना है | वह मानव या किसी प्राणी-विशेष को ही बल प्रदान करती हो, ऐसा नहीं- आदि-युग से ही यह जगन्माता इस संसार को बढाती चली आ रही है | आदि माता द्वारा निर्मित सृष्टि को जननी से मिला रही है | बल-वर्धिनी माता की अद्बुत शक्ति से जो परिचित हो गया, उसका जन्म तो सफल हो ही जाता है, उसके सामने त्रिभुवन की सम्पति भी तृण के सामान तुच्छ हो जाती है, क्योंकि जिस पुत्र पर माता-पिता का स्नेह हाथ फिर जाता है वह धन्य हो जाता है | “बाला’ ( बल-वर्धिनी ) का सेवक कभी निर्बल नहीं रह सकता और विश्वासी पर किसकी दया नहीं होती | बाला पहले अपने पुत्र को बल देती है और फिर बुद्धि | इन सब की प्राप्ति तभी होगी, जब संसार के लोग माता बाला की शरण में आयेंगें |

विश्वात्मिका शक्तिश्रीबाला

शिव और शक्ति- तत्व सृष्टी के आदि कारण है, वे जब ही कल्पना करते है , तभी सृष्टी होने लगती है | महा प्रलय के बाद जब “एकोहम बहु स्याम प्रजाये” की कल्पना होती है, तभी शक्ति-तत्व-शिव-तत्व से अलग होता है |

उसके पहले वे एक ही रहते है | उस एक रहने का नाम नाद है अर्थात सृष्टी की कल्पना होने के समय निष्क्रिय शिव और सक्रिय शक्ति की जो विपरीत रति होती है उसे ही नाद कहते है और इसी विपरीत रति द्वारा बिन्दु की उत्पति होती है | शक्ति जब निष्कल शिव से युक्त होती है, तब वे चिद-रूपिणी और विश्वोत्तीर्णा अर्थात विश्व के बाहर रहती है और जब वे सकल शिव के साथ होती है तब वे विश्वात्मिका होती है परा शक्ति वे है, जो चैतन्य के साथ विश्रमावस्था में रहती है | इनको ही कादी-विद्या में “महा-काली” कहा जाता है और हादी विद्या में “महा-त्रिपुर-सुंदरी.

नाद से जो बिन्दु उत्पन्न होता है वही श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी है अर्थात महा-त्रिपुर-सुंदरी नाद है और श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी बिन्दु है जो शक्ति विश्वोत्तीर्णा है, वही महा-त्रिपुर-सुंदरी है और जो विश्वात्मिका है वे ही श्रीबाला है .

दुसरे प्रकार से विचार करे तो उपनिषद के अनुसार जाग्रत, स्वप्न और सुशुप्ताभिमानी विश्व “तैजस और प्राज्ञ पुरुष है . इन त्रि-मात्राओं के दर्शन से पता चलता है कि शक्ति ही जगत-रूप में अभिव्यक्त है

वाक्य द्वारा इसका वर्णन नहीं किया जा सकता | अत: यह सिद्धांत निकलता है की नाद को बिन्दु में युक्त करना चाहिए | उक्त व्याख्या से स्पष्ट है की महा-त्रिपुर-सुंदरी से श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी को युक्त समझना आवश्यक है | वास्तव में नामान्तर से दो भेद “शक्ति” के प्रतीत होते है, जो वस्तुतः एक ही है, कोई भेद नहीं है | जो नाद है वही बिन्दु है | जो महा-त्रिपुर-सुंदरी है वही श्रीबाला-त्रिपुर-सुंदरी है |

** श्रीबाला गायत्री मंत्र **

बालाशक्तयै च विद्महे त्र्यक्षर्यै च धीमहि तन्नः शक्तिः प्रचोदयात् |

ऐं वाकऐश्वर्ये विद्महे क्लीं कामेश्वर्ये धीमहि तन्नः शक्ति प्रचोदयात् |

भगवती बाला त्रिपुरा सुंदरी की उपासना भोग और मोक्ष दायिनी हैं। माता भगवती बाला त्रिपुरा सुंदरी बहुचराजी मेरी कुलदेवी हैं जिससे हम अज्ञानी पर उनका विशेष स्नेह और अनुग्रह हैं। भगवती बाला त्रिपुरा सुंदरी की उपासना के लिए हमें हमारे गुरुदेवश्रीउर्वशीबेन तथा सम्पूर्ण गुरूमंडलका अनन्य आशीर्वाद प्राप्त हैं। श्रीराजराजेश्वरीपीठ (कड़ी, उत्तरगुजरात) स्वयं सिध्द श्री विद्या पीठ हैं।

Awakening Shakti

Kundalinili (Shakti) desires to meet Pure counciousness (Lord Shiva) hence move faster after few Chakras are pierced. First two – Muladhar and Swadhisthan are hardest to get pierced because it is very basic Pashu instincts of security, food, family, friends etc. Pure counciousness (Shiva state) can’t be achieved without Shakti.

मूलाधारैक निलया, ब्रह्मग्रन्थि विभेदिनी ।

मणिपूरान्त रुदिता, विष्णुग्रन्थि विभेदिनी ॥ 38 ॥

आज्ञा चक्रान्तरालस्था, रुद्रग्रन्थि विभेदिनी ।

सहस्राराम्बुजा रूढा, सुधासाराभि वर्षिणी ॥ 39 ॥

-Lalita Sahastranamam Stotram

http://www.sanskritimagazine.com/indian-religions/hinduism/awakening-shakti/

Anand no Garbo (The Song of Bliss)

શ્રીઆનંદગરબાનો પ્રાગટયોત્સવ

આનંદ ના ગરબાની રચના

આજે ફાગણ સુદ ત્રીજ ને બુદ્ધવાર – આનંદ ના ગરબા ની રચના તિથી……

“ આનંદ નો ગરબો “ આનંદ શબ્દ સાંભળતાની સાથે જ ચહેરા પર એક અનેરો આનંદ જ છવાઈ જાય છે. મનમાં એક અનેરો ઉત્સાહ ઉત્પન્ન થઇ જાય છે. માનવીના જીવનમાં આનંદની અનુભૂતિ થવાથી શોક, દુ:ખ, ભય કે વ્યાધી જોજનો દુર ચાલ્યા જાય છે.

આ કપટી, અટપટી, સ્વાર્થી દુનિયામાં આનંદ મેળવવા માટેનો ટૂંકો માર્ગ એટલે “ આનંદ નો ગરબો “

આનંદ નો ગરબો એટલે જ્ઞાનની ગરિમા, મનનો મહિમા, ચિત્તની ચતુરાઈ અને દિલની હૃદયથી થતી પ્રસન્નતા.

આ કલિયુગ માં આનંદ ના ગરબા ને “ કલ્પવૃક્ષ “ સમાન ગણવામાં આવ્યો છે.

વાતની શરૂવાત અહીથી થાય છે કે આપણા ગુજરાત નું અમદાવાદ શહેર અમે તેમાં આવેલું નવાપુરા ગામ. એ ગામ માં એક ભટ્ટ મેવાડા બ્રાહ્મણ શ્રીહરિરામ ભટ્ટ અને ફૂલકોરબાઈ રહેતા.તેમના ઇષ્ટદેવ એકલિંગજી મહાદેવ છે. તેમણે ૧૬૯૬- આસો સુદ આઠમ ( દુર્ગાષ્ટમી ) ના રોજ બે જોડિયા બાળકો ને જન્મ આપ્યો. જેમાં એકનું નામ વલ્લભરામ અને બીજાનું નામ ધોળારામ.

બંન્ને બાળકો જયારે પાંચ વર્ષના થયા ત્યારે તેમને વિદ્યાભ્યાસ માટે પરમાનંદ બ્રહ્મચારી પાસે આશ્રમમાં ભણવા માટે મુકવામાં આવ્યા.પણ ખુબ પરિશ્રમ કરવા છતાંપણ એમણે વિદ્યાભ્યાસ નું જ્ઞાન આવ્યું જ નહિ. હા, બંન્ને ભાઈઓ નમ્ર, વિવેકી અને શ્રદ્ધાળુ હતા. વિદ્યાભ્યાસ નું જ્ઞાન ન મળવાને લીધે ગુરુજીએ બંન્ને બાળકો ને બાલા ત્રિપુરા સુંદરી માં બહુચરનો બીજ મંત્ર આપ્યો.

આ મંત્ર સાથે બંન્ને બાળકો પોતાના ઘરે ગયા. બંન્ને ભાઈઓ તેમની કાલીઘેલી વાણીમાં આખો દિવસ માં ના બીજમંત્રનું જપ કર્યા કરતા.તેઓના માતા – પિતા જાત્રાએ ગયેલ ત્યારે માં બહુચર “ બાળા “ સ્વરૂપે પ્રગટ થયા. માનું જાજરમાન તેજસ્વીરૂપ ન જોઈ શકવાના કારણે બંન્ને ભાઈઓ આંખો બંધ કરીને માં ને પૂછવા લાગ્યા કે આપ કોણ છો…? ત્યારે માં એ ભાઈઓને ઓળખ આપી કે હું તમારી માં છુ. ત્યારબાદ બંન્ને ભાઈઓને ઈચ્છિત વરદાન માગવા કહ્યું. માં ને પ્રત્યક્ષ નજરો-નજર નિહાળ્યા બાદ બંન્ને ભાઈઓના હૃદય પુલકિત થઇ ગયા. અને રોમે-રોમ આનંદિત થઇ ઉઠ્યું.

માં એ ફરીથી એમને કહ્યું કે માગો – માગો જે જોઈએ તે આપું. પરંતુ માના દર્શન માત્રથી જ આનંદ મળવાના કારણે બંન્ને ભાઈઓ માની સમક્ષ કઈ બોલી કે માંગી ના શક્યા. ત્યારે માં એ ત્રીજી વખત કહ્યું કે બેટા માગ, માંગે તે આપું. ત્યારે વલ્લભરામે માતાજીને વિનંતી કરી કે હે માં…!!! આપના દર્શન માત્રથી અમારા જીવનમાં આનંદ, આનંદ, અને માત્ર આનંદ જ છવાઈ ગયો છે અમને જે આનંદ પ્રાપ્ત થયો એવો આનંદ સૌને મળે એવું કઈક આપો. ત્યારે માં એ કહ્યું કે તમે મારા આનંદ ના ગરબા ની રચના કરો, પણ વલ્લભરામે કહ્યું કે હે માં…!!! અમે તો અભણ છીએ તો કેવી રીતે ગરબાની રચના કરી શકીએ ? ત્યારે માં એ વલ્લભરામને કહ્યું કે હું સરસ્વતી સ્વરૂપે જીભનાં અગ્રભાગ પર બિરાજમાન થઈશ એમ કહી માં એ તેમની ટચલી આંગળી વલ્લભરામની જીભના અગ્રભાગ પર મુકી ત્યારબાદ જે કઈ પણ તેમના દ્વારા રચનાઓ થઇ તે અલૌકિક અને અકાલ્પનિક છે.

આનંદ ના ગરબા ની રચના શ્રી વલ્લભરામે માત્ર ૧૨ વર્ષ , ૪ મહિના, ૨૬ દિવસની નાની કિશોર અવસ્થામાં વિક્રમ સંવત ૧૭૦૯ના ફાગણ સુદ ત્રીજ (૩) ને બુદ્ધવારે કરી. છેલ્લા ૩૬૫ વર્ષથી સતત ભક્તો ને આનંદ જ આપ્યા કરે છે. આનંદ ના ગરબા ની ૧૧૬ મી પંક્તિ માં લખવામાં આવ્યું છે કે,

“ સવંત સતદશ સાત, નવ ફાલ્ગુન સુદે માં, તિથી તૃતીયા વિખ્યાત, શુભ વાસર બુદ્ધે માં,

આનંદ ગરબા વિશેષ :-

  • ૧૧૮ પદ નો ગરબો જેમાં દરેકની બે પંક્તિ હોવાથી ૨૩૬ પંક્તિઓ થાય
  • ગરબા માં ૬૭૫ શબ્દો
  • ગરબા માં ૩૭૨૩ અક્ષરો
  • ગરબા માં ૭ વખત “ બહુચર માં “ શબ્દ
  • આ ગરબા ની પ્રથમ પંક્તિ નો પ્રથમ શબ્દ “ આઈ “ છે જેનો અર્થ “ માં “ થાય અને ગરબાની છેલ્લી પંક્તિનો છેલ્લો શબ્દ પણ “ માં “ જ છે.
  • ગરબા માં ૨૪૫ વખત “ માં “ શબ્દ
  • આ ગરબા નું કેન્દ્રબિંદુ જ “ માં “ છે.
  • આ ગરબા માં વેદ- પુરાણ , ભાગવત ગીતા, રામાયણ, મહાભારત, ઉપનિષદ જેવા મહાન ગ્રંથો નો સમાવેશ
  • આ ગરબા માં ત્રણ લોક, ત્રણ શક્તિ, ચાર વેદ, ચૌદ ભુવન, ચૌદ વિદ્યા, પંચ મહાભૂત, ચાર યુગ, ત્રણ જીવ, ત્રણ વાયુ, ત્રણ ગુણ, ત્રણ દેવ, દસ અવતાર, ચૌદ રત્નો, નવ નાથ, ચોર્યાશી સિદ્ધો, પાંચ પાંડવ, અઢાર પુરાણ, ત્રણ કાળ, છ ઋતુ, છ રસ, બાર માસ, પંચામૃત, ચાર શત્રુ, સાત ધાતુ, પાંચ રંગ, આઠ પર્વત, અઢાર ભાર વનસ્પતિ, ચાર વર્ણ, ચૌદ ઇન્દ્રિયો, ચોર્યાશી લાખ જંતુઓ, નવ ખંડ, ત્રીભેટ, દસ દિશા, ચાર મંગળ, સાત સાગર, નવ ગ્રહ, દસ દિશા ના રક્ષક, પાંચ પદારથ, ત્રણ દોષ નો અદભૂત સમન્વય.
  • એક જ આસન પર બેસીને ત્રણ વખત આનંદ નો ગરબો કરવાથી “ ચંડીપાઠ “ કર્યા જેટલું પુણ્ય પ્રાપ્ત થાય છે.
  • આનંદના ગરબા મા સંસ્કૃત, પ્રાકૃત, માગધી, અર્ધ માગધી, ગુજરાતી, હિન્દી, મરાઠી, ગામઠી,તળપદી જેવી અનેક ભાષાઓના શબ્દોનો સમાવેશ છે.
  • આનંદનો ગરબો ફક્ત બહુચરમાં આંગળી નહિ પરંતુ કોઇ પણ ઇષ્ટ કે કુળદેવી આગળ કરી શકાય એટલે જ અંબાજી બહુચરાજી જેવા ગુજરાતના મંદિરો પીઠો મા આનંદના ગરબાના નિત્ય ૩ પાઠ થાય છે.એટલેજ કેહવાય છે કે આનંદ નો ગરબો એ શક્તિ ઉપાસકો નું અમૂલ્ય ઘરેણું છે.
  • આનંદ નો ગરબો એ શક્તિ આરાધનાનો ગરબો છે.

આનંદનો ગરબો કરવાથી મળતું ફળ :-

  • નિર્ધન ને ધન પ્રાપ્ત થાય
  • રોગીઓના રોગ દુર, દુ:ખ , દર્દ દુર થાય
  • શેર માટીની ખોટ પૂરી થાય
  • કેન્સર, ડાયાબીટીશ જેવા ભયંકર અને મોટા રોગો દુર થાય
  • આંખ, કાન, નાક, વાચા, વાણી ની તકલીફો દુર થાય
  • મનોવાંછિત ફળની પ્રાપ્તિ
  • ટૂંક માં એટલું કહી શકાય છે “ આનંદ નો ગરબો “ એટલે તન, મન ની પ્રસન્નતા, સુખ શાંતિ નો સમન્વય અને “ માં “ પરાશક્તિનું સાક્ષાત દર્શન.

ખાસ નોધ :-

આનંદ નો ગરબો એ શક્તિ ઉપાસકો નું અમૂલ્ય ઘરેણું છે, આજથી આપણે આ ફાગણ સુદ ત્રીજને “ આનંદ તૃતીયા “ તિથી થી મનાવીશું….

પ.પૂજય શ્રી વલ્લભ ભટ્ટ રચિત શ્રી બહુચર માઁ નો આનંદ ગરબા નો આજ ૩૬૫ મો પ્રાગટય દિન વિ. સં. ૧૭૦૯ ફાગણ સુદ ત્રીજ બુધવાર.આજ ફાગણ સુદ ૩ ને રવિવાર તારીખ ૧૮-૨-૨૦૧૮.

આપડી આજુબાજુ માં રહેતા દરેક વ્યક્તિ, દરેક સોસાયટી, મહોલ્લા, પોળ કે એરિયામાં રહેતા દરેક રહેવાસી ગરબામાં વધુમાં વધુ જોડાય , માં ની સ્તુતિ, પ્રાર્થના, ગરબો કરતા થાય એવા પ્રયત્નો કરીશું. જેટલા વધુમાં વધુ મંડળો બને એવા પ્રયત્નો કરીશું.

માં બાલા ત્રિપુરા સુંદરી માં બહુચર આપની, આપના પરિવારની સર્વે મનોકામના પૂર્ણ કરે એવી માં ને પ્રાર્થના સહ સૌને મારા…….

જય અંબે…….જય બહુચર……..

🌹આનંદનો ગરબો 🌷

☘વલ્લભ ભટ્ટ☘

આજ મુંને આનંદ, વાધ્યો અતિ ઘણો મા,

ગાવા ગરબા છંદ, બહુચર માત તણો મા. ૧

અળવે આળ પંપાળ, અપેક્ષા જ આણી મા,

છો ઇચ્છા પ્રતિપાળ, દ્યો અમૃતવાણી મા. ૨

સ્વર્ગ મૃત્યુ પાતાળ, વાસ સકળ તહારો મા,

બાળ કરી સંભાળ, કર ઝાલો મ્હારો મા. ૩

તોતળા જ મુખ તન્ન, તાતો તોય કહે મા,

અર્ભક માગે અન્ન, નિજ માતા મન લ્હે મા ૪

નહીં સવ્ય અપસવ્ય, કહી કાંઇ જાણું મા,

કળી કહાવ્યા કાવ્ય, મન મિથ્યા આણું મા ૫

કુળજ કુપાત્ર કુશીલ, કર્મ અકર્મ ભર્યો મા,

મૂરખમાં અણમીલ, રસ રટવા વિચર્યો મા ૬

મૂઢ પ્રમાણે મત્ય, મન મિથ્યા માપી મા,

કોણ લહે ઉત્પત્ય, વિશ્વ રહ્યા વ્યાપી મા ૭

પ્રાક્રમ પૌઢ પ્રચંડ, પ્રબળ ન પલ પ્રીચ્છું મા,

પૂરણ પ્રગટ અખંડ, અજ્ઞ થકો ઇચ્છું મા ૮

અર્ણવ ઓછે પાત્ર, અકળ કરી આણું મા,

પામું નહીં પળમાત્ર, મન જાણું નાણું મા ૯

રસના યુગ્મ હજાર, એ રટતાં હાર્યો મા,

ઇશેં અંશ લગાર લઇ મન્મથ માર્યો મા ૧૦

માર્કંડ મુનિરાય મુખ , માહાત્યમ ભાખ્યું મા,

જૈમિની ઋષિ જેવાય, ઉર અંતર રાખ્યું મા. ૧૧

અણ ગણ ગુણ ગતિ ગોત, ખેલ ખરો ન્યારો મા,

માત જાગતી જ્યોત, ઝળહળતો પારો મા. ૧૨

જશ તૃણવત ગુણગાથ, કહું ઉંડળ ગુંડળ મા,

ભરવા બુદ્ધિ બે હાથ, ઓધામાં ઉંડળ મા. ૧૩

પાઘ નમાવી શીશ, કહું ઘેલું ગાંડુ મા,

માત ન ધરશો રીસ, છો ખોલ્લું ખાંડું મા. ૧૪

આદ્ય નિરંજન એક, અલખ અકળ રાણી મા,

તું થી અવર અનેક, વિસ્તરતાં જાણી મા. ૧૫

શક્તિ સૃજવા સ્રૂષ્ટ, સહજ સ્વભાવ સ્વલ્પ મા,

કિંચિત્ કરુણા દ્રષ્ટ, કૃત કૃત્ય કોટી કલ્પ મા. ૧૬

માતંગી મન મુક્ત, રમવા મન દીધું મા,

જોવા જુક્ત અજુગ્ત, ચૌદ ભુવન કીધું મા. ૧૭

નીર ગગન ભૂ તેજ, સહેજ કરી નીર્મ્યાં મા,

મારુત વશ જે છે જ, ભાંડ જ કરી ભરમ્યા મા. ૧૮

તત્ક્ષણ તનથી દેહ, ત્રણ કરી પેદા મા,

ભવકૃત કર્તા જેહ, સરજે પાળે છેદા મા. ૧૯

પ્રથમ કર્યા ઉચ્ચાર, વેદ ચારે વાયક મા,

ધર્મ સમસ્ત પ્રકાર, ભૂ ભણવા લાયક મા. ૨૦

પ્રગટી પંચ મહાભૂત, અવર સર્વ જે કો મા,

શક્તિ સર્વ સંયુક્ત, શક્તિ વિના નહીં કો મા. ૨૧

મૂળ મહીં મંડાણ, મહા માહેશ્વરી મા,

જુગ સચરાચર જાણ, જય વિશ્વેશ્વરી મા. ૨૨

જડ મધ્યે જડસાંઇ , પોઢયા જગજીવન મા,

બેઠાં અંતરીક્ષ આઇ, ખોળે રાખી તન મા. ૨૩

વ્યોમ વિમાનની વાટ્ય , ઠાઠ ઠઠયો આછો મા,

ઘટ ઘટ સરખો ઘાટ, કાચ બન્યો કાચો મા. ૨૪

અજ રજ ગુણ અવતાર, આકાશે જાણી મા,

ર્નિમિત હિત નરનાર, નખશિખ નારાયણી મા. ૨૫

પન્નગને પશુ પક્ષ , પૃથક પૃથક પ્રાણી મા,

જુગ જુગ માંહિ ઝંખી, રુપે રૃદ્રાણી મા. ૨૬

ચક્ષુ મધ્ય ચૈતન્ય વચ ચાસન ટીકી મા,

જણાવવા જન મન્ય, મધ્ય માત કીકી મા. ૨૭

અણૂચર તૃણચર વાયુ, ચર વારિ ચરતા મા,

ઉદર ઉદર ભરી આયુ, તું ભવની ભર્તા મા. ૨૮

રજો તમો ને સત્વ, ત્રિગુણાત્મા ત્રાતા મા,

ત્રિભુવન તારણ તત્વ, જગ્ત તણી જાતા મા. ૨૯

જ્યાં જયમ ત્યાં ત્યમ રુપ, તેં જ ધર્યું સઘળે મા,

કોટી ધુંવાડે ઘૂપ, કોઇ તુજ કો ન કળે મા. ૩૦

મેરુ શિખર મહી માંહ્ય , ધોળાગઢ પાસે મા,

બાળી બહુચર આય, આદ્ય વસે વાસો મા. ૩૧

ન લ્હે બ્રહ્મા ભેદ, ગુહ્ય ગતિ તાહરી મા,

વાણી વખાણે વેદ, શી જ મતિ માહરી મા. ૩૨

વિષ્ણુ વિમાસી મન્ય, ધન્ય જ ઉચ્ચરિયા મા,

અવર ન તુ જ થી અન્ય, બાળી બહુચરિયા મા. ૩૩

માણે મન માહેશ, માત મયા કીધે મા,

જાણે સુરપતિ શેષ, સહુ તારે લીધે મા. ૩૪

સહસ્ત્ર ફણાધર શેષ, શક્ત શબલ સાધી મા,

નામ ધર્યું નાગેશ, કીર્તિ જ તો વાધી મા. ૩૫

મચ્છ કચ્છ વારાહ, નૃસિંહ વામન થઇ મા,

એ અવતારો તારાહ , તું જ મહાત્યમ મયી મા. ૩૬

પરશુરામ શ્રીરામ રામ, બળી બળ જેહ મા,

બુદ્ધ કલ્કી નામ, દશ વિધ ધારી દેહ મા. ૩૭

મધ્ય મથુરાથી બાળ, ગોકુળ તો પહોત્યું મા,

તેં નાખી મોહજાળ, કોઇ બીજું ન્હોતું મા. ૩૮

કૃષ્ણા કૃષ્ણ અવતાર, કળી કારણ કીધું મા,

ભુક્તિ મુક્તિ દાતાર, થઇ દર્શન દીધું મા. ૩૯

વ્યંઢળને નર નાર, એ પુરુષાં પાંખોં મા,

એ આચાર સંસાર, શ્રુતિ સ્મૃતિએ ભાખું મા. ૪૦

જાણ્યે વ્યંઢળ કાય, જગ્ત કહે જુગ્ત મા,

માત મોટો મહિમાય,ન લ્હે ઇન્દ્ર યુગત મા. ૪૧

મ્હેરામણ મથ મેર, કીધ ઘોર રવૈયો સ્થિર મા,

આકર્ષણ એક તેર, વાસુકિના નેતર મા. ૪૨

સુર સંકટ હરનાર, સેવકને સન્મુખ મા,

અવિગત અગમ અપાર, આનંદ નિધિ સુખ મા. ૪૩

સનકાદિક મુનિ સાથ, સેવી વિવિધ વિધ્યે મા,

આરાધી નવનાથ, ચોર્યાસી સિદ્ધે મા. ૪૪

આઇ અયોધ્યા ઇશ, નામી શિશ વળ્યાં મા,

દશ મસ્તક ભુજ વીસ, છેદી સીત મળ્યા મા. ૪૫

નૃપ ભીમકની કુમારી તમ પૂજ્યે પામી મા,

રુક્ષ્મણી રમણ મુરારી મન ગમતો સ્વામી મા. ૪૬

રાખ્યા પાંડુ કુમાર, છાના સ્ત્રી સંગે મા,

સંવત્સર એક બાર, વામ્યા તમ આંગે મા. ૪૭

બાંધ્યો તન પ્રધ્યુમ્ન , છૂટે નહીં કો થી મા,

સમરી પૂરી સલખન , ગયો કારાગ્રુહથી મા. ૪૮

વેદ પુરાણ પ્રમાણ, શાસ્ત્ર સકલ સાક્ષી મા,

શક્તિ સૃષ્ટિ મંડાણ, સર્વ રહ્યા રાખી મા. ૪૯

જે જે જાગ્યાં જોઇ, ત્યાં ત્યાં તુ તેવી મા,

સમ વિભ્રમ મતિ ખોઇ, કહી ન શકું કેવી મા. ૫૦

ભૂત ભવિષ્ય વર્તમાન, ભગવતી તું ભવની મા,

આદ્ય મધ્ય અવસાન, આકાશે અવની મા. ૫૧

તિમિર હરણ શશીસૂર, તે તહારો ધોખો મા,

અમી અગ્નિ ભરપૂર, થઇ શોખો પોખો મા. ૫૨

ખટ ઋતુ રસ ખટ માસ, દ્વાદશ પ્રતિબન્ધે મા,

અંધકાર ઉજાસ, અનુક્રમ અનુસન્ધે મા. ૫૩

ધરથી પર ધન ધન્ય, ધ્યાન ધર્યે નાવો મા,

પાલણ પ્રજા પર્જન્ય , અણચિંતવ્યા આવો મા. ૫૪

સકલ સ્રુષ્ટી સુખદાયી, પયદધી ધૃત માંહી મા,

સમ ને સર સરસાંઇ, તું વિણ નહીં કાંઇ મા. ૫૫

સુખ દુખ બે સંસાર, તાહરા નિપજાવ્યા મા,

બુદ્ધિ બળ ની બલિહાર, ઘણું ડાહ્યાં વાહ્યાં મા. ૫૬

ક્ષુધા તૃષા નિદ્રાય, લઘુ યૌવન વૃદ્ધા મા,

શાંતિ શૌર્ય ક્ષમાય, તું સઘળે શ્રદ્ધા મા. ૫૭

કામ ક્રોધ મોહ લોભ, મદ મત્સર મમતા મા,

તૃષ્ણા સ્થિરતા ક્ષોભ, શર્મ ધૈર્ય સમતા મા. ૫૮

અર્થ ધર્મ ને કામ, મોક્ષ તું મહંમાયા મા,

વિશ્વ તણો વિશ્રામ, ઉર અંતર છાયા માં. ૫૯

ઉદય ઉદાહરણ અસ્ત, આદ્ય અનાદીની મા,

ભાષા ભૂર સમસ્ત, વાક વિવાદીની મા. ૬૦

હરખ હાસ્ય ઉપહાસ્ , કાવ્ય કવિત વિત તું મા,

ભાવ ભેદ નિજ ભાષ્ય, ભ્રાંતિ ભલી ચિત્ત તું મા. ૬૧

ગીત નૃત્ય વાદીંત્ર , તાલ તાન માને મા,

વાણી વિવિધ વિચિત્ર, ગુણ અગણિત ગાને મા. ૬૨

રતિ રસ વિવિધ વિલાસ, આશ સક્લ જગની મા,

તન મન મધ્યે વાસ, મહંમાયા મગ્ની મા. ૬૩

જાણ્યે અજાણ્યે જગ્ત , બે બાધા જાણે મા,

જીવ સકળ આસક્ત, સહુ સરખા માણે મા. ૬૪

વિવિધ ભોગ મરજાદ, જગ દાખ્યું ચાખ્યું મા,

ઘ્રુત સુરત નિઃસ્વાદ, પદ પોતે રાખ્યું મા. ૬૫

જડ, થડ, શાખા, પત્ર, પુષ્પ ફળે ફળતી મા,

પરમાણુ એક માત્ર, રસ બસ વિચરતી( “નીશી વાસર ચળતી માં” એવો પાઠ ભેદ પણ છે ) મા. ૬૬

નિપટ અટપટી વાત, નામ કહું કોનું મા,

સરજી સાતે ઘાત, માત અધિક સોનું મા. ૬૭

રત્ન, મણિ માણિક્ય, નંગ મુંગીયા મુક્તા મા,

આભા અટળ અધિક્ય , અન્ય ન સંયુક્તા મા. ૬૮

નીલ પીત, આરક્ત, શ્યામ શ્વેત સરખી મા,

ઉભય વ્યક્ત અવ્યક્ત, જગ્ત જશી નિરખી મા. ૬૯

નગ જે અધિકુળ આઠ, હિમાચલ આદ્યે મા,

પવન ગગન ઠઠી ઠાઠ, તુજ રચિતા માધ્યે મા. ૭૦

વાપી કૂપ તળાવ, તું સરિતા સિંધુ મા,

જળ તારણ જયમ નાવ, ત્યમ તારણ બંધુ મા. ૭૧

વનસ્પતિ ભાર અઢાર, ભૂ ઉપર ઊભાં મા,

કૃત્ય ક્રુત્ય તું કીરતાર , કોશ વિધાં કુંભા મા. ૭૨

જડ ચૈતન અભિધાન અંશ અંશધારી મા,

માનવ મોટે માન, એ કરણી તારી મા. ૭૩

વર્ણ ચાર નીજ કર્મ ધર્મ સહિત સ્થાપી મા,

બેને બાર અપર્મ અનુચર વર આપી મા. ૭૪

વાડવ વહ્ની નિવાસ, મુખ માતા પોતે મા,

તૃપ્તે તૃપ્તે ગ્રાસ, માત જગન જોતે મા. ૭૫

લક્ષ ચોર્યાસી જંત, સહુ ત્હારા કીધા મા,

આણ્યો અસુરનો અંત, દણ્ડ ભલા દીધા મા. ૭૬

દુષ્ટ દમ્યા કંઈ વાર, દારુણ દુઃખ દેતાં મા,

દૈત્ય કર્યાં સંહાર, ભાગ યજ્ઞ લેતાં મા. ૭૭

શુદ્ધ કરણ સંસાર, કર ત્રિશુળ લીધું મા,

ભૂમિ તણો શિરભાર, હરવા મન કીધું મા. ૭૮

બહુચર બુદ્ધિ ઉદાર, ખળ ખોળી ખાવા મા,

સંત કરણ ભવપાર, સાદ્ય કર્યે સહાવા મા. ૭૯

અધમ ઓધારણ હાર, આસનથી ઊઠી મા,

રાખણ જુગ વ્યવહાર, બધ્ય બાંધી મુઠ્ઠી મા. ૮૦

આણી મન આનંદ, મહીં માંડયાં પગલાં મા,

તેજ પુંજ રવિ ચંદ્ર , દૈ નાના ડગલાં મા. ૮૧

ભર્યાં કદમ બે ચાર, મદમાતી મદભર મા,

મનમાં કરી વિચાર, તેડાવ્યો અનુચર મા. ૮૨

કુરકટ કરી આરોહ, કરુણાકર ચાલી મા,

નખ, પંખી મય લોહ , પગ પૃથ્વી હાલી મા. ૮૩

ઊડીને આકાશ, થઈ અદ્ભુત આવ્યો મા,

અધક્ષણમાં એક શ્વાસ અવનિતળ લાવ્યો મા. ૮૪

પાપી કરણ નીપ્રાત, પૃથ્વી પડ માંહે મા,

ગોઠયું મન ગુજરાત, ભીલાંભડ માંહે મા. ૮૫

ભોળી ભવાની આય, ભોળાં સો ભાળે મા,

કીધી ધણી કૃપાય, ચુંવાળે આળે મા. ૮૬

નવખંડ ન્યાળી નેઠ, નજર વજ્જર પેઢી મા,

ત્રણ ગામ તરભેટ્ય , ઠેઠ અડી બેઠી મા. ૮૭

સેવક સારણ કાજ, સલખનપુર શેઢે મા,

ઊઠયો એક અવાજ, ડેડાણા નેડે મા. ૮૮

આવ્યો અશર્ણા શર્ણ , અતિ આનંદ ભર્યો મા,

ઉદિત મુદિત રવિકિર્ણ, દસદિશ જશ પ્રસર્યો મા. ૮૯

સકલ સમ્રુધ્ધી સુખમાત, બેઠાં ચિત સ્થિર થઈ મા,

વસુધા મધ્ય વિખ્યાત, વાત્ય વાયુ વિધ ગઈ મા. ૯૦

જાણે જગત બધ્ય જોર, જગજનુની જોખે મા,

અધિક ઉઠયો શોર, વાત કરી ગોંખે મા. ૯૧

ચાર ખૂંટ ચોખાણ, ચર્ચા એ ચાલી મા,

જનજન પ્રતિ મુખવાણ્ય , બહુચર બિરદાળી મા. ૯૨

ઉદો ઉદો જયજય કાર, કીધો નવખંડે મા,

મંગળ વર્ત્યાં ચાર, ચઉદે બ્રહ્મંડે મા. ૯૩

ગાજ્યા સાગર સાત દૂધે મેઘ વુઠયા મા,

અધમ અધર્મ ઉત્પાત, સહુ કીધા જૂઠા મા. ૯૪

હરખ્યાં સુર નર નાગ, મુખ જોઈ માતા નું મા,

અલૌકિક અનુરાગ મન મુનિ સરખાનું મા. ૯૫

નવગ્રહ નમવા કાજ, પાઘ પળી આવ્યા મા,

લુણ ઉવારણ કાજ, મણિમુક્તા લાવ્યાં મા. ૯૬

દશ દિશના દિગ્પાળ દેખી દુઃખ વામ્યા મા,

જન્મ મરણ જંજાળ, જિતી સુખ પામ્યા મા. ૯૭

ગુણ ગંધર્વ જશ ગાન, નૃત્ય કરે રંભા મા,

સુર સ્વર સુણતા કાન, ગત થઈ ગઈ થંભા મા. ૯૮

ગુણનિધિ ગરબો જેહ, બહુચર આપ તણો મા,

ધારે ધરી તે દેહ, સફળ ફરે ફેરો મા. ૯૯

પામે પદારથ પાંચ, શ્રવણે સાંભળતા મા,

ના’વે ઉન્હી આંચ, દાવાનળ બળતા મા. ૧૦૦

સહસ્ર ન ભેદે અંગ, આદ્ય શક્તિ શાખે મા,

નિત્ય નિત્ય નવલે રંગ, શમ દમ મર્મ પાખે મા. ૧૦૧

જળ જે અકળ અઘાત, ઉતારે બેડે મા,

ક્ષણ ક્ષણ નિશદિન પ્રાત: , ભવસંકટ ફેડે મા. ૧૦૨

ભૂત પ્રેત જંભુક વ્યંતર ડાકીની મા,

ના વે આડી અચૂક, સમર્યે શાકીણી મા. ૧૦૩

ચકણ કરણ ગતિ ભંગ ખુંગ પુંગ વાળે મા,

ગુંગ મુંગ મુખ અબધ વ્યાધિ બધી ટાળે મા. ૧૦૪

શેણ વિહોણા નેણ નેહે તું આપે, મા,

પુત્ર વિહોણા કહેણ દૈ મેણા કાપે મા. ૧૦૫

કળી કલ્પતરુ ઝાડ, જે જાણે તૂં ને મા,

ભક્ત લડાવે લાડ, પાડ વિના કેને મા. ૧૦૬

પ્રગટ પુરુષ પુરુષાઈ, તું આલે પળમાં મા,

ઠાલાં ઘેર ઠકુરાઈ, દ્યો દલ હલબલમાં મા. ૧૦૭

નિર્ધનને ધન પાત્ર, કર્તા તૂં છે મા,

રોગ, દોષ દુઃખ માત્ર, હર્તા શું છે મા ? ૧૦૮

હય, ગજ, રથ સુખપાલ, આલ્ય વિના અજરે મા,

બીરદે બહુચર માલ, ન્યાલ કરે નજરે મા. ૧૦૯

ધર્મ ધજા ધન ધાન્ય , ન ટળે ધામ થકી મા,

મહિપતિ મુખ દે માન્ય , માં ના નામ થકી મા. ૧૧૦

નરનારી ધરી દેહ, જે હેતે ગાશે મા,

કુમતિ કર્મ કૃત ખેહ, થઈ ઊડી જાશે મા. ૧૧૧

ભગવતી ગીત ચરિત્ર, જે સુણશે કાને મા,

થઈ કુળ સહિત પવિત્ર, ચડશે વૈમાને મા. ૧૧૨

તું થી નથી કો વસ્ત જેથી તું ને તર્પું મા,

પૂરણ પ્રગટ પ્રસશ્ત, શી ઉપમા અર્પું મા. ૧૧૩

વારંવાર પ્રણામ, કર જોડી કીજે મા,

નિર્મળ નિશ્વળ નામ, જગજનનીનું લીજે મા. ૧૧૪

નમ: ૐ નમ: ૐ જગમાત, નામ સહસ્ત્ર તાહરે મા,

માત તાત ને ભ્રાત તું સર્વે માહરે મા. ૧૧૫

સંવત શત દશ સાત, નવ ફાલ્ગન સુદે મા,

તિથિ તૃતીયા વિખ્યાત, શુભ વાસર બુધે મા. ૧૧૬

રાજનગર નિજ ધામ, પુર નવીન મધ્યે મા,

આઈ આદ્ય વિશ્રામ, જાણે જગ બધ્યે મા. ૧૧૭

કરી દુર્લભ સુલર્ભ, રહું છું છેવાડો મા,

કર જોડી વલ્લભ, કહે ભટ્ટ મેવાડો.૧૧૮

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