Kundalini Explained

कुंडलिनी सब योगोंमैं सबसे शक्तिशाली और उतना ही सबसे दुर्धर्ष योग हैं, गुरु आज्ञा और मार्गदर्शन के बिना प्रयत्न ना करे।

आध्यात्मिक शरीर (सात चक्र मंत्र और प्रभाव )

ललिता सहस्रनाम के अनुसार सात चक्र की अधिष्ठात्रि देवीयों के नाम और वर्णन निम्न दिए हैं

(१) विशुद्धि चक्र – डाकिनी देवी

विशुद्धि चक्रनिलया,‌रक्तवर्णा, त्रिलोचना 

खट्वाङ्गादि प्रहरणा, वदनैक समन्विता  

पायसान्नप्रिया, त्वक्‍स्था, पशुलोक भयङ्करी 

अमृतादि महाशक्ति संवृता, डाकिनीश्वरी 

(२) अनाहत चक्र – राकिनी देवी

अनाहताब्ज निलया, श्यामाभा, वदनद्वया 

दंष्ट्रोज्ज्वला,‌क्षमालाधिधरा, रुधिर संस्थिता  

कालरात्र्यादि शक्त्योघवृता, स्निग्धौदनप्रिया 

महावीरेन्द्र वरदा, राकिण्यम्बा स्वरूपिणी 

(३) मणिपुर चक्र – लाकिनी देवी

मणिपूराब्ज निलया, वदनत्रय संयुता 

वज्राधिकायुधोपेता, डामर्यादिभि रावृता  

रक्तवर्णा, मांसनिष्ठा, गुडान्न प्रीतमानसा 

समस्त भक्तसुखदा, लाकिन्यम्बा स्वरूपिणी  

(४) स्वाधिष्ठान चक्र – क़ाकिनी देवी

स्वाधिष्ठानाम्बु जगता, चतुर्वक्त्र मनोहरा 

शूलाद्यायुध सम्पन्ना, पीतवर्णा,‌तिगर्विता  

मेदोनिष्ठा, मधुप्रीता, बन्दिन्यादि समन्विता 

दध्यन्नासक्त हृदया, काकिनी रूपधारिणी  

(५) मूलाधार चक्र – साकिनी देवी

मूला धाराम्बुजारूढा, पञ्चवक्त्रा,‌स्थिसंस्थिता 

अङ्कुशादि प्रहरणा, वरदादि निषेविता  

मुद्गौदनासक्त चित्ता, साकिन्यम्बास्वरूपिणी 

(६) आज्ञा चक्र – हाकिनी देवी

आज्ञा चक्राब्जनिलया, शुक्लवर्णा, षडानना  

मज्जासंस्था, हंसवती मुख्यशक्ति समन्विता 

हरिद्रान्नैक रसिका, हाकिनी रूपधारिणी 

(७) सहस्त्रार चक्र – याकिनि देवी

सहस्रदल पद्मस्था, सर्ववर्णोप शोभिता 

सर्वायुधधरा, शुक्ल संस्थिता, सर्वतोमुखी ।।

सर्वौदन प्रीतचित्ता, याकिन्यम्बा स्वरूपिणी 

इन चक्रो की अधिष्ठात्रि देवीओ को ललिता सहस्त्रनाम के अनुसार ही समझना चाहिये निम्न चित्रोमैं उनका क्रम यथार्थ नहीं हैं।

1. आधार चक्र:

यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला यह “आधार चक्र” रक्तवर्णी है।

९९.९(99.9)% लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है और वे इसी चक्र में रहकर मर जाते हैं। जिनके जीवन में भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता है, उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है।

मंत्र : “लं”

चक्र जगाने की विधि: मनुष्य तब तक पशुवत् है, जब तक कि वह इस चक्र में जी रहा है। इसीलिए भोग, निद्रा और संभोग पर संयम रखते हुए इस चक्र पर लगातार ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। इसको जाग्रत करने का दूसरा नियम है, यम और नियम का पालन करते हुए साक्षी भाव में रहना।

प्रभाव :

इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतर वीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत हो जाते है। सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए वीरता, निर्भीकता और जागरूकता का होना जरूरी है।

2. स्वाधिष्ठान चक्र :

यह वह चक्र है, जो लिंग मूल से चार अंगुल ऊपर स्थित है। जिसकी छ पंखुरियां हैं। यह चक्र कौसुम्भः, नारङगवर्णः का है।

अगर आपकी ऊर्जा इस चक्र पर ही एकत्रित है, तो आपके जीवन में आमोद-प्रमोद, मनोरंजन, घूमना-फिरना और मौज-मस्ती करने की प्रधानता रहेगी। यह सब करते हुए ही आपका जीवन कब व्यतीत हो जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा और हाथ फिर भी खाली रह जाएंगे।

मंत्र : “वं”

कैसे जाग्रत करें :

जीवन में मनोरंजन जरूरी है, लेकिन मनोरंजन की आदत नहीं। मनोरंजन भी व्यक्ति की चेतना को बेहोशी में धकेलता है। फिल्म सच्ची नहीं होती। लेकिन उससे जुड़कर आप जो अनुभव करते हैं, वह आपके बेहोश जीवन जीने का प्रमाण है। आप जानते हैं, नाटक और मनोरंजन सच नहीं होते। प्रभाव : इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश होता है। सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि उक्त सारे दुर्गुण समाप्त हो, तभी सिद्धियाँ आपका द्वार खटखटाएंगी।

3. मणिपुर चक्र :

नाभि के मूल में स्थित पित वर्ण का यह चक्र शरीर के अंतर्गत “मणिपुर” नामक तीसरा चक्र है। यह चक्र स्वर्णिम (पित)वर्णी है।

जो दस कमल पंखुरियों से युक्त है।

जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहां एकत्रित है, उसे काम करने की धुन-सी रहती है। ऐसे लोगों को कर्मयोगी कहते हैं। ये लोग दुनिया का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं।

मंत्र : “रं”

कैसे जाग्रत करें :

आपके कार्य को सकारात्मक आयाम देने के लिए इस चक्र पर ध्यान लगाएंगे। पेट से श्वास लें।

प्रभाव :

इसके सक्रिय होने से तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि कषाय-क्लेश दूर हो जाते हैं। यह चक्र मूल रूप से आत्मशक्ति प्रदान करता है। सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए आत्मवान होना जरूरी है। आत्मवान होने के लिए यह अनुभव करना जरूरी है कि आप शरीर नहीं, आत्मा हैं। आत्मशक्ति, आत्मबल और आत्मसम्मान के साथ जीवन का कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं।

4. अनाहत चक्र :

हृदय स्थल में स्थित हरितवर्ण का द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से युक्त द्वादश अक्षरों से सुशोभित चक्र ही “अनाहत चक्र” है।

अगर आपकी ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है, तो आप एक सृजनशील व्यक्ति होंगे। हर क्षण आप कुछ न कुछ नया रचने की सोचते हैं। आप चित्रकार, कवि, कहानीकार, इंजीनियर आदि हो सकते हैं।

मंत्र : “यं”

कैसे जाग्रत करें :

हृदय पर संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। खासकर रात्रि को सोने से पूर्व इस चक्र पर ध्यान लगाने से यह अभ्यास से जाग्रत होने लगता है और “सुषुम्ना” इस चक्र को भेदकर ऊपर गमन करने लगती है। प्रभाव : इसके सक्रिय होने पर लिप्सा, कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार आदि समाप्त हो जाते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और संवेदना का जागरण होता है। इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समक्ष ज्ञान स्वत: ही प्रकट होने लगत व्यक्ति अत्यंत आत्मविश्वस्त, सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित व्यक्तित्व बन जाता हैं। ऐसा व्यक्ति अत्यंत हितैषी एवं बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी एवं सर्व प्रिय बन जाता है।

5. विशुद्ध चक्र :

कंठ में सरस्वती का स्थान है, जहां “विशुद्ध चक्र” है और जो सोलह पंखुरियों वाला है। यह चक्र नीलवर्णी है।

सामान्यतौर पर यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र के आसपास एकत्रित है, तो आप अति शक्तिशाली होंगे।

मंत्र : “हं”

कैसे जाग्रत करें :

कंठ में संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।

प्रभाव :

इसके जाग्रत होने पर सोलह कलाओं और सोलह विभूतियों का ज्ञान हो जाता है। इसके जाग्रत होने से जहां भूख और प्यास को रोका जा सकता है। वहीं मौसम के प्रभाव को भी रोका जा सकता है।

6. आज्ञाचक्र :

भ्रूमध्य (दोनों आंखों के बीच भृकुटि में)

यह चक्र शौणवर्णी है।

में “आज्ञा-चक्र” है और जो दो पंखुरियों वाला है।

सामान्यतौर पर जिस व्यक्ति की ऊर्जा यहां ज्यादा सक्रिय है, तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमागका बन जाता है। लेकिन वह सब कुछ जानने के बावज़ूद मौन रहता है। इसे “बौद्धिक सिद्धि” कहते हैं।

मंत्र : “ऊं”

कैसे जाग्रत करें :

भृकुटि के मध्य में ध्यान लगाते हुए साक्षी भाव में रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।

प्रभाव :

यहां अपार शक्तियाँ और सिद्धियाँ निवास करती हैं। इस “आज्ञा चक्र” का जागरण होने से ये सभी शक्तियाँ जाग पड़ती हैं और व्यक्ति एक सिद्धपुरुष बन जाता है।

7. सहस्रार चक्र :

“सहस्रार” की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है अर्थात् जहां चोटी रखते हैं। यदि व्यक्ति यम, नियम का पालन करते हुए यहां तक पहुंच गया है तो वह आनंदमय शरीर में स्थित हो गया है। ऐसे व्यक्ति को संसार, संन्यास और सिद्धियों से कोई मतलब नहीं रहता है।

कैसे जाग्रत करें :

“मूलाधार” से होते हुए ही “सहस्रार” तक पहुंचा जा सकता है। लगातार ध्यान करते रहने से यह श्वेतवर्णका “चक्र” जाग्रत हो जाता है और व्यक्ति परमहंस के पद को प्राप्त कर लेता है।

प्रभाव :

शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण विद्युतीय और जैवीय विद्युत का संग्रह है। यही “मोक्ष” का द्वार है।   

कुंडलिनी सब योगोंमैं सबसे शक्तिशाली और उतना ही सबसे दुर्धर्ष योग हैं, गुरु आज्ञा और मार्गदर्शन के बिना प्रयत्न ना करे।

जगज्जननी भट्टारिका महात्रिपुरसुन्दरी (Lalita Tripur Sundari) का ध्यान रहस्य

जगज्जननी भट्टारिका महात्रिपुरसुन्दरी का ध्यान श्लोक , जो #श्रीदत्तात्रेय महागुरु के मुखारविन्द से प्रस्फुटित हुआ है । यह ध्यान श्लोक अनेक आगमिक रहस्यों से पूर्ण है ।

#अरुणां करुणातरंग्ड़िताक्षीं

धृतपाशांकुशबाणचापहस्ताम्।

अणिमादिभिरावृतां मयूखै-

रहमित्येव विभावये भवानीम्।।

अर्थात् मैं अणिमा आदि सिद्धिमयी किरणों से आवृत भवानी का ध्यान करता हूँ। उनके शरीर का रंग लाल है, नेत्रों में करुणा लहरा रही है तथा हाथों में पाश, अंकुश, बाण और धनुष शोभा पाते हैं ।

अरुण – लाल रंग

मयूख – किरण , चरण की कान्ति

अणिमादि- अष्ट सिद्धियां

करुणा – दया

तरंगित – लहरदार, उन्मेष

अक्ष – आँख , मातृका ‘अ’ से लेकर ‘क्ष’ तक ज्ञान शक्ति।

पाश, अंकुश, बाण और धनुष

श्रीललिताम्बा के षोडशी रूप का वर्णन है।

#शाम्भवी शुक्लरूपा च #श्रीविद्या_रक्तरूपगा।

श्यामला श्यामरूपाख्या. एताश्चगुणशक्तय:।। श्रीविद्या ललिताम्बा का शरीर रूप #अरुणाभ अर्थात् लाल रंग – रक्त रूपगा है और लाक्षा के रंग जैसा है । तुलना करें। कादि मत में कहा गया :

#त्वत्देहोत्थिततेजोभि: किरणैरणिमादिभि:।

आदृतां त्वां महति भावयेस्त्वत्समो भवेदिति।।

हे देवि! तुम्हारी देह से प्रष्फुटित तेजमय किरणों , समस्त अष्ट सिद्धियों का जो रूप है, भावना द्वारा भक्त तुम्हारे समान ही हो जाता है।

अक्ष:– मातृका , जो श्रीदेवी के दोनों नेत्र हैं। मीनाक्षी हैं।

#आदिमुखा कादिकरा टादिपदा पादिपार्श्वयुड्मध्या।

यादि हृदया संविद्रूपा सरस्वती जयति ।।( महामहेश्वर अभिनवगुप्त)

स्वर वर्ण मुख, कवर्ग हाथ, टवर्ग पैर, पवर्ग जंघा, यवर्ग हृदय ऐसी संवित रूप वाली सरस्वती की जय हो ।संवित् – 365 दिनमान से अतीत अब श्रीभगवद्पादाचार्य शंकराचार्य महाराज सौन्दर्यलहरी में कह रहे हैं:

स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाद्याभिरभित:

निषेव्ये नित्ये त्वामहमिति सदा भावयति य:।

किमाश्चर्यं तस्यत्रिनयनसमृद्धिं तृणयत:

महासंवर्ताग्निर्विरचयति नीराजनविधिम्।।( सौन्दर्य लहरी 30)

अर्थात् हे नित्ये! आश्पके शरीरावयवभूत चरणों से उत्पन्न रश्मियों एवं अणिमादि अष्टसिद्धियों से घिरी हुई आपका जो साधक “ अहं” इस अभेद भावना से ध्यान करता है, सूर्य चन्द्राग्नि रूप समृद्धि वाले अथवा इड़ा, पिंग्ड़ला, सुषुम्ना के उपायों से प्राप्त होने वाले, सदाशिव की समृद्धि को तुच्छ समझने वाले उस साधक की आरती प्रलयकालीन संवर्ताग्नि भी करे तो इसमें कौन सा आश्चर्य है ।

भाव यह है कि “ अहं” परामर्श दृढ़ होने पर तादात्म्य सिद्ध जब हो जाता है ऐसे साधक की आरती प्रलयाग्नि भी उतारती है, इसमें आश्चर्य की क्या बात है!

#श्रीललिताम्बा सोलह नित्याओं के रूप में प्रत्येक मास की प्रतिपदा से पूर्णिमा और अमावस्या तक आराधित होती हैं । ( खड्गमाला और नित्याएं )

#मयूख: चरणों से निकलने वाली किरणें

पृथ्वी से 56, जल से 52, अग्नि से 62, वायु से 54, आकाश से 72, और मन से 67 मयूखों की संख्या है।कुल 363 मयूख ।

अग्नि में 108, सूर्य में 116 और चंद्र में 136 कलाएं हैं – कुल 360 कलाएं – एक सम्पूर्ण वृत्त गोल ।

#इन सबके ऊपर श्रीदेवी के #दिव्य चरण हैं ।

इसका संदर्भ श्रीभाष्कर राय मखीन ने वरिवस्या रहस्य के ध्यान और न्यास के प्रसंग मे किया है । ध्यान- अरुणा करुणा—-, छंद- पंक्ति आदि अपने भाष्य में लिखा है ।(श्लोक 161)।

यह ध्यान श्लोक अति रहस्यमय है और गहन है ।